रामपुर से कांग्रेस ने उतारा उम्मीदवार, जया प्रदा, आजम खान या संजय किसका पलड़ा है भारी

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लखनऊ : लोकसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान होते ही सभी पार्टियों में एक जंग सी छिड़ गई है. खासकर यूपी की सभी सीटों पर कांग्रेस, सपा-बसपा, बीजेपी सभी कब्जा करना चाहती हैं. जीत की मंशा तो हर किसी की है, लेकिन समाजवादी पार्टी की नेता जया प्रदा के रामपुर से चुनाव लड़ने की अटकलों ने मुकाबले को और भी दिलचस्प बना दिया है. जया प्रदा के बीजेपी ज्वाइन करने के बाद से इस बात की सरगमियां तेजी पर हैं कि वह रामपुर से बीजेपी की प्रत्याशी बनकर चुनाव लड़ेंगी.

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जयाप्रदा पड़ेंगी कांग्रेस और आजम खान पर भारी!
जयाप्रदा रामपुर लोकसभा सीट से 2004 और 2009 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल कर चुकी हैं. इस मुस्लिम बहुल संसदीय क्षेत्र से बीजेपी को उम्मीदवार मिल गया है जो यहां पर सपा-बसपा गठबंधन के अलावा कांग्रेस को भी कड़ी चुनौती दे सकती हैं.

10 बार कांग्रेस के खाते में गई है यह सीट
उत्तर प्रदेश में कई लोकसभा सीटें ऐसी हैं जहां पर मुस्लिम समुदाय बहुसंख्यक है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट इन्हीं में से एक है. यहां पर 50 फीसदी से भी अधिक जनसंख्या मुस्लिम आबादी की है, ये क्षेत्र समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान का गढ़ माना जाता है. हालांकि, 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में यहां से भारतीय जनता पार्टी के नेपाल सिंह ने जीत दर्ज की थी. 2014 में उत्तर प्रदेश से कोई भी मुस्लिम सांसद चुनकर नहीं गया था, जो कि इतिहास में पहली बार हुआ था.

आजम खान ने बदली रामपुर की तस्वीर!
आज़म ख़ान पहले 1980 से 95 तक और फिर 2002 से लेकर अब तक रामपुर के विधायक रहे हैं. लेकिन जब से समाजवादी पार्टी की सरकार में उनका कद बढ़ा तब से लेकर अबतक रामपुर पर सरकार मेहरबान रही है. ऐसा भी कहा जाता है कि रामपुर में जितना भी विकास हुआ है सब आजम खान की बदलौत ही हुआ है. 1999 के मुकाबले यूपी के अन्य शहरों से रामपुर की तुलना की जाए तो यहां पर सड़क, साफ-सफाई का जो कुछ भी काम हुआ है उसका श्रेय सपा सरकार को ही जाता है.

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रामपुर लोकसभा सीट का इतिहास
आजादी के बाद से ही इस सीट की गिनती मुस्लिम बहुल सीटों में से होती रही. 1952 में हुए चुनाव में यहां से कांग्रेस की ओर से डॉ. अबुल कलाम आज़ाद ने जीत दर्ज की थी. 1952 से लेकर 1971 तक इस सीट पर कांग्रेस ने ही जीत दर्ज की, 1977 में एक बार भारतीय लोकदल के प्रत्याशी यहां से जीते. लेकिन दोबारा कांग्रेस का दबदबा इस सीट पर रहा.

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