किसान आंदोलन का ‘जंतर-मंतर’ !
आक्रोश की आवाज से लेकर चुनौतियों की चीत्कार तक, भावनाओं के भंवर से लेकर याचना और यलगार तक पिछले कुछ दिनों में दिल्ली की दरख्तों ने सबकुछ देखा. आंदोलन की दीवार खड़ी रही और सरकार अपने पर अड़ी रही लिहाजा समाधान कुछ नहीं निकला. लेकिन बीते 8 महीने से कृषि कानून की वापसी की मांग को लेकर दिल्ली की दहलीज पर डटे किसानों के आंदोलन ने अब एक नया मोड़ ले लिया है. एक तरफ संसद का मानसून सत्र चल रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ जंतर-मंतर पर संयुक्त किसान मोर्चा (SKM) के नेतृत्व में ‘किसान संसद’ बैठी.
कृषि कानूनों के खिलाफ मोर्चा बुलंद करने वाले किसान संगठनों का कहना है कि, जब तक संसद का मानसून सत्र जारी रहेगा वो रोजाना यहां पर ऐसी ही किसान ‘संसद’ लगाएंगे. हर दिन किसान मंडल का नेतृत्व अलग होगा. इसमें 3 स्पीकर और 3 डिप्टी स्पीकर नियुक्त किए गए हैं. ‘संसद’ की प्रक्रिया रोजाना यही रहेगी लेकिन चेहरे बदलते रहेंगे. यानी रोज किसानों के साथ उनके दल के नेता भी बदलते रहेंगे. बात साफ है तीन नए कृषि कानूनों की बुनियाद पर खड़ी आंदोलन की दीवार हाल-फिलहाल ढहती नजर नहीं आ रही है.
बहरहाल किसान नेताओं का रूप बदला है, आंदोलन का प्रारुप बदला है, लेकिन मांग वही है केंद्र सरकार तीनों नए कृषि कानूनों को वापस ले. किसानों की समस्या पर संसद के भीतर विपक्ष सरकार की घेराबंदी करने की पुरजोर कोशिश कर रहा है. तो वहीं संसद के बाहर अपनी अलग ‘संसद’ लगाकर अन्नदाता समाधान का मंतर तलाश रहे हैं. मसलन दिल्ली की फिजाओं में एक बार फिर किसान आंदोलन के स्वर बुलंद होते सुनाई दे रहे हैं. एक बार फिर महानगरी के मुहाने पर दहकते सवालों की गूंज सुनाई दे रही है. सवाल ये कि जिन कृषि कानूनों को सरकार ऐतिहासिक बता रही है उनपर किसानों को इतना एतराज क्यों है? कृषि कानूनों को लेकर आजीविका का असमंजस बरकरार क्यों है? संवाद और सामंजस्य के रास्ते पर आंदोलन की दरकार क्यों है? कृषि कानूनों को लेकर किसानों और सरकार के बीच तकरार क्यों है ? तमाम बहस और बयानों से इतर ये वो सवाल हैं जिन्हें दिल्ली के दालानों में भरती नमी भी सोख नहीं पा रही है।
