लखनऊ: 2019 के आम चुनाव के लिए खास फॉर्मूले की खोज में लगे तमाम सियासी दल, अब अपनी नीति और रणनीति को धार देने में लग गए हैं. सपा-बसपा के राजनीतिक रिश्ते को लेकर, जो किस्से-कहानियां और कयास लगाए जाते रहे थे. उत्तर प्रदेश के सियासी कैनवास उसका किरदार उकेरा जा चुका है. 25 साल बने इस सियासी योग में सबकुछ अनायस नहीं है बल्कि सियासी पंडितों की मानें तो ये गठबंधन देश और प्रदेश की राजनीति में फिर से नई इबारत लिख सकता है.
मुलायम सिंह और कांशीराम की जोड़ी का कमाल
साल 1992-1993 में जब देश मंडल और कमंडल के साथ-साथ राम लहर पर सवार था. बीजेपी का सियासी सूरज अपनी तपिश से सभी दलों को झुलसा रहा था. तब मुलायम सिंह यादव और कांशीराम ने सपा-बसपा का गठबंधन करके राजनीति के क्षितिज पर अपनी शानदार मौजूदगी का ना केवल एहसास कराया बल्कि सरकार भी बनाई थी.
अखिलेश यादव-मायावती के गठबंधन में प्लस प्वाइंट
उत्तर प्रदेश में हुए उपचुनाव में बसपा-बसपा अपनी मौजूदा सियासी ताकत का ट्रेलर दिखा चुके हैं. फूलपुर-गोरखपुर और कैराना के उपचुनाव में सपा-बसपा के गठजोड़ ने सत्ताधारी बीजेपी को शिकस्त दी थी. इन परिणामों से साफ हो गया था कि, ये दोनों पार्टियां अपना वोट एक दूसरे को ट्रांसफर कराने की क्षमता रखते है. खासकर मायावती का वोटबैंक बिघरना नहीं बल्कि उन्होंने अपना वोट सपा को दिलाया. ऐसे में इन दोनों के साथ आने का मतलब है कि, दोनों का वोट गठबंधन के प्रत्याशी के पक्ष में जाएगा जो बीजेपी के लिए बड़ी मुसीबत का सबब बनेगा.
जातीय समीकरण जीत की गारंटी है
यूपी में किसी बड़ी जाति समुदाय का किसी एक पार्टी के पक्ष में जाने का मतलब होता है सत्ता की चाबी का हाथ आना. अब सपा-बसपा के गठबंधन में जातीय समीकरण को समझें तो यूपी में इस समय करीब 22 फीसदी दलित वोटर हैं इनमें 14-16 प्रतिशत जाटव वोट बहन जी का मजबूत वोटबैंक माना जाता है. वहीं बाकी के 8 फीसदी दलित मतदाताओं में पासी, धोबी, खटीक, मुसहर, कोली, बाल्मिकी, गोड और खरवार जैसी जातियां शामिल हैं. वहीं सपा के वोट बैंक की बात करें तो 45 फीसदी ओबीसी वोटरों में 10 फीसदी यादव सपा का सबसे मजबूत वोटर माना जाता है, इनके अलावा 5 फीसदी कुर्मी, 5 फीसदी मौर्य, 4 फीसदी लोधी, 2 फीसदी जाट वोट में भी समाजवादी पार्टी का सियासी हिस्सा काफी हद तक ठीक है. इनके अलावा बाकी के 19 फीसदी वोटरों में गुर्जर राजभर, बिंद बियार, मल्लाह निषाद, चौरसिया, प्रजापति, लोहार कुम्हार जैसी जातियां शामिल हैं. वहीं प्रदेश के 19 फीसदी मुस्लिम वोटर भी सपा-बसपा के गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण साबित होंगे.
बीते आंकड़े बोलते हैं
बीते करीब एक दशक से ज्यादा के विधानसभा और लोकसभा चुनावों के आंकड़ों में सपा बसपा, बीजेपी कांग्रेस का वोट प्रतिशत देखें तो आंकड़े बताते हैं कि, सपा बसपा का एक साथ आना एक नई इबारत लिखेगा क्योंकि, 2012 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो कांग्रेस को 11.63%, बीजेपी को 15% वोट मिले थे, वहीं सपा के 29.16 और बीएसपी के 25.92 वोट को मिलाकर देखें तो दोनों को 55.08% वोट मिले थे.

2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को 7.50%, बीजेपी को 42.30% वोट मिले थे, यहां सपा के 22.20 और बीएसपी के 19.60% वोट का वजन 41.08% होता है. 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 6.2%, बीजेपी को 39.7% वोट मिले थे, तब सपा के 22% और बीएसपी के 22.2% वोट का गठबंधन 44.02% रहा था.
अभी चुनाव हुए तो
इसमें कोई शक नहीं कि, देश के सियासी दंगल में उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा रणक्षेत्र हैं. और इसमें भी कोई शक नहीं दिख रहा है कि, सपा-बसपा का गठबंधन सबसे बड़ा गठबंधन होगा जो बीजेपी के लिए बड़ी चुनौती साबित होगा.जातीय समीकरण और वोट प्रतिशत के लिहाज से हुआ एक सर्वे बताता है कि, अगर अभी भी चुनाव होते हैं तो सपा-बसपा का गठबंधन 50 से ज्यादा सीटों पर बाजी मार सकता है.
