महिला दिवस: कितना हकीकत, किसका फसाना?

अन्य जिले बिना श्रेणी होमपेज स्लाइडर

तिरे माथे पे ये आंचल तो बहुत ही ख़ूब है लेकिन…तू इस आंचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था.
नई दिल्ली: 8 मार्च कलेंडर की तारीखों इसे महिलाओं का दिन कहा जाता है. यानि इस दिन अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है. अधिकारिक रूप से संयुक्त राष्ट्र द्वारा 8मार्च 1975 में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस की घोषणा की गई थी तबसे इसे हर साल मनाया जाता है. इस बार की थीम है ‘बैलेंस फॉर बेटर’. हर साल नारी शक्ति के लिए तमाम सम्मेलन होते हैं, मंच सजते हैं, महिला कल्याण के लिए तमाम अनमोल बातें कही जाती हैं. लेकिन क्या कुछ बदला महिलाओं के लिए? क्या सम्मेलन और सेमिनारों से आगे महिलाओं के हक की बात उठ पाई. इस मौके पर क्या है देश के तमाम क्षेत्रों की महिलाओं की राय apnauttarpradesh.co.in पर ‘महिला दिवस’ की कहानी महिलाओं की जुबानी.

‘देश को चलाने में हो सहभागिता’


सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता प्रज्ञा भूषण जी के शब्दों में महिला दिवस को समझें तो वो कहती हैं कि, महिला ! अर्थात इस पृथ्वी की क़रीब आधी आबादी जिसका इस सृष्टि के सृजन में उतना ही या उससे अधिक योगदान है , जितना एक पुरुष का है. हमारा देश वो देश है जहां स्त्री को देवी रूप में पूजा जाता है परंतु विडम्बना ये है कि, उस भारत देश में आज भी महिलाओं को अपने अधिकारो के लिए हर क़दम पर लड़ना पड़ता है. अपने अधिकारों से लेकर अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए पुरुषों पर निर्भर होना पड़ता है. सही मायनो में हम तब महिला दिवस मना पाएंगे जब देश की हर महिला केवल आत्मनिर्भर ही नहीं होगी अपितु अपने परिवार और प्रियजनो का संरक्षण कर पाएगी.जब दिन के किसी भी पहर में बिना किसी पुरुष पर निर्भर हुए बेख़ौफ़ इस समाज में विचर पाएगी. सरकार से हमें यही अपेक्षा है कि जिस दिन देश की ये आधी आबादी संसद से लेकर पंचायत तक, देश को चलाने में अपनी आधी सहभागिता दे पाए, देश का आधा नेतृत्व महिलायें संभालती हुई दिखें, तब माना सकेगा की ये देश, सही मायने में महिलाओं को उनका उचित हक़ दे पाया है .

‘थोड़ा बदलाव आया है, थोड़े की और जरुरत है’

मॉडल और अभिनेत्री मीनाक्षी शर्मा कहती हैं कि, मेरी नजर में ‘महिला दिवस’ का मतलब है जब महिला पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो सामाजिक आर्थिक रूप से सशक्त होकर अपने पैरों पर खड़ी हो. आज महिलाएं पुरूषों के साथ-कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं. वो देश के विकास में उतनी ही भागीदार है जितने पुरुष.पहले के मुकाबले आर्थिक, सामाजिक और मानसिक स्थिति सुधरी है, महिलाओं में सशक्तिकरण आया है, पहले से ज्यादा आत्मविश्वसी हैं वो अपने विचार खुलकर रख पाती हैं. अभी भी हम लोग कहीं ना कही थोड़ा पीछे हैं क्योंकि सभी महिलाएं उस प्लेटफॉर्म पर नहीं आ पाई हैं. अभी महिलाओं को अपने सम्मान के लिए और लड़ना होगा.
पिछले 10 सालों में देखें तो महिलाओं की स्थिति में सुधार आया है. तमाम महिलाओं ने ऊंचे पदों पर पहुंच कर खुद को साबित किया है. लेकिन महिला सुरक्षा अभी भी एक बड़ा मुद्दा है. महिला सुरक्षा सबसे पहला कदम होना चाहिए.

‘महिला दिवस एक ढकोसला या भेड़चाल बनकर ना रह जाए’

कवयित्री और साहित्यकार रूपा पाण्डेय सतरूपा जी कहती हैं कि, सृष्टि जननी स्त्री को सम्मान समर्पित करने का कोई एकदिन तय नहीं किया जा सकता. फिर भी यदि हर्षित समाज स्त्री के अमूल्य योगदान के लिए उनको प्यार सम्मान सराहना देना चाहता तो स्वागत है. महिला जिससे शुरू होती है जिन्दगी और सजती हैं खुशियां, जुटती हैं सहूलियत, व्यवस्थित होते हैं घर, आंगन, संस्कार, धर्म और विश्वास. आज सोचती हूं कि हमारे पुराने जमाने की पुरखा पुरनिया दादी काकी नानी आदि को तो पता भी नहीं था कि उनका कोई अपना दिवस भी है. लम्बे घूंघट में तपते चौके में चूल्हे के पास पसीने में बतर संयुक्त परिवार की एक बड़ी जेवनार रोज बनाकर खिला कर बाद में बचा हुआ खाकर धन्य होने वाली वो नारियां बस कर्तव्य जानती थीं. उनके समर्पित जीवन का एक अंश भी हम सब आज नहीं बन सकते हैं इसलिए मैं उन पूर्वज माताओं को आज बारम्बार प्रणाम करती हूं. आज बढ़ती हुई कन्या भ्रूण हत्याओं से महिलाओं की संख्या कम हो रही जिससे तमाम अपराध सामाजिक संकट चुनौती बन गये हैं. बदलते परिवेश में आज समाज के दोनों घटक पुरुष व स्त्री शिक्षित सक्षम और सशक्त हो तभी उन्नति की कल्पना हो सकती है. महिला दिवस एक ढकोसला या भेड़चाल बनकर ना रह जाय इसके लिए हमें तय करना होगा कि संचालन की सबसे मजबूत कड़ी महिला किसी भी मायने में कमजोर ना की जाए. बेटी बेटा का फर्क बेटी बहू का फर्क मिटाना होगा.बेटों को नारी जाति का सम्मान सिखाना होगा. अधिकार और कर्तव्य दोनों साथ साथ चलेंगे तो हम दिवस उल्लास और सम्मान का महिला दिवस कहलायेगा. अपने एक मुक्तक द्वारा सभी महिलाओं को हार्दिक शुभकामनाएं देती हूं

माँ बहन प्रेयसि पत्नी बेटी हर रूप में पूर्ण समर्पित हो, मानव जीवन की शुद्धि हेतु ईश्वर से कृत-संकल्पित हो ।
कर्तव्य पूर्ण जीवन जीतीं अधिकार गौण हो जाते हैं , बेटों से श्रेष्ठ हुईं इतनी अब पितर भी तुमसे तर्पित हों ।।

‘महिलाओं को हर रोज समानता की लड़ाई लड़नी पड़ती है’

 

सोशल एक्टिविस्ट हुमा नाज़ कहती हैं कि, आज भी महिलाओं के साथ दोहरा मापदंड अपनाया जाता है. किसी तरह पढ़ाई पूरी कर लें तो भी नौकरी की समस्या. नौकरी के लिए लड़ाई और अगर नौकरी मिल जाए तो वहां भी महिलाओं को आज भी पुरुषों से कम आंका जाता है. महिलाओं को अपने कार्यस्थल पर हर रोज समानता की लड़ाई लड़नी पड़ती है. सुरक्षा आज सबसे बड़ी मसला है. महिलाएं आज भी खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर पाती हैं. कहने को तो हम आज 21वीं सदी में हैं लेकिन घर से लेकर स्कूल, कॉलेज ऑफिस में एक असुरक्षा की भावना रहता है. महिला दिवस सही मायनों में तभी मुकम्मल होगा जब ऐसा माहौल बने कि, महिलाएं खुद को कहीं भी सुरक्षित महसूस कर सकें. असुरक्षा के चलते तमाम लड़कियों की पढ़ाई बीच में छूट जाती है. सरकार से मेरा निवेदन है कि, गांव कस्बों में बच्चियों की पढ़ाई के लिए अच्छ स्कूल खोले जाएं.

‘अपनी जगह खुद बना रही हैं महिलाएं, आजादी-सम्मान और प्रतिष्ठा मिले’

नारी तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत नग पग तल में पीयूष स्रोत सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में! इस मौके पर लखनऊ की  भावना सिंह कहती हैं कि, अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर मैं सरकार से यह चाहूंगी की वह हमें आजादी दे, सम्मान दें, प्रतिष्ठा दे. महिलाएं अपनी जगह खुद बना रही हैं. हर क्षेत्र में चाहे वह घर हो या दफ्तर. हमें सरकार से आशा है कि वे पुरुषों को महिलाओं के प्रति सम्मान करना सिखाएं इसके लिए उन्हें स्कूल कॉलेज, दफ्तर, अस्पताल जैसे जगहों में पुरुषों के लिए काउंसलिंग होनी चाहिए. जहां उन्हें यह बताया जाए कि महिलाएं इस देश का हिस्सा ही नहीं आपके जीवन का हिस्सा हैं. जहां उन्हें सम्मान प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए. स्कूलों में लड़कों के लिए एक अलग से काउंसलिंग क्लास होनी चाहिए. जहां पर उन्हें मोरल एजुकेशन एवं महिलाओं जैसे विषयों पर मोरल एजुकेशन दी जानी चाहिए. आज यह पहल कल के लिए नया सवेरा बन सकता है. हमारी नीव स्कूल में बनती है इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हम उन्हें स्कूल से ही यह शिक्षा दें.

‘महिला है तो मुमकिन है.. महिला नहीं तो कुछ नहीं’

 

पाकिस्तान तक की ईंट से ईंट बजा देने वालीं फेमस टीवी एंकर निदा अहमद कहती हैं कि, जन्म से लेकर मरने तक महिला केवल अपने आत्मसम्मान के साथ जीना चाहती है. लेकिन उसे सम्मान देने की जगह पीड़ा दी जाती है. क्या इसलिए ही महिलाओं के सम्मान के लिए इस दिवस को मनाया जाता है? महिलाएं कमजोर नहीं हैं वे जानती हैं कि कैसे छोटी-छोटी चीजों में खुश रहा जाता है. सब्र और सहनशक्ति की बात की जाए तो महिलाएं इसका जीता-जागता उदाहरण हैं. ‘औरतों को कमजोर बनाने की कोशिश करना फितरत तुम्हारी, लेकिन उनका हौसला तोड़ना है नामुमकिन’. औरत अगर अपनी खुशी को भुलाकर सब सह सकती है तो वह अपने आत्मसम्मान के लिए एक दिन आवाज भी उठा सकती है, इसलिए उसे कमजोर समझने की भूल करना व्यर्थ है. मेरी नज़र मे हर दिवस महिला दिवस है, महिला किसी एक दिन की मोहताज नहीं!! क्योंकि महिला है तो मुमकिन है. महिला नहीं तो कुछ नहीं.

किसी भी तरह कमजोर नहीं हैं महिलाएं

 

 

मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाली ह्यूमन राइट एक्टिविस्ट शबनम खान कहती हैं कि, इस महिला दिवस की विशेष रूप से देश के पुरुषों के लिए शुभकामनाएं. क्योंकि, देश के पुरुषों को ही महिलाओं को सम्मान के साथ लेकर चलना होगा. इसके लिए जागरूक होना होगा.महिलाएं कमजोर नहीं हैं इसलिए सरकार से गुजारिश है कि, महिलाओं को कमजोर बताने वाले या उन्हें प्रोडक्ट की तरह यूज करने वाले प्रोग्राम, विज्ञापन, सीरियल आदि पर प्रतिबंध लगाया जाए. और उन्हें रोते हुए दिखाने के बदले उनका सशक्त रूप दिखाने वाले प्रोग्राम को प्रमोट किया जाए. देश की हर महिला जो घर या बाहर काम करती है उसको समाज बराबरी का दर्जा मिले.

https://apnauttarpradesh.co.in परिवार की ओर से आप सभी को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ की शुभकामनाएं!

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *