लखनऊ/प्रयागराज: पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाईकोर्ट की बेंच की मांग ने एक बार फिर जोर पकड़ा है. करीब 22 जिलों की कोर्ट कचहरी में उस वक्त टाइपराइटरों की खटपट खामोश हो गई जब. इन तमाम जिलों के वकील आंदोलन पर उतार आए. आंदोलकारी वकीलों ने अफना कामकाज बंद करके सड़कों पर प्रदर्शन किया और अपने-अपने सांसदों/विधायकों के घरों का घेराव किया. गाजियाबाद में तो आंदोलनकारी वकीलों ने सांसद वीके सिंह के घर पर तालाबंदी करने की कोशिश भी की. वहीं इस बार आंदोलनकारी वकीलों की दलील है कि, ‘अगर बेंच नहीं तो 2019 में वोट भी नहीं’
क्यों हो रही है पश्चिम में बेंच की मांग
2 से 5 करोड़ की आबादी वाले राज्यों में 2-2 बेंच और करीब 20-22 करोड़ की आबादी वाले यूपी में केवल 1 बेंच हैं. इसमें पश्चिमी यूपी की 8 करोड़ की आबादी को एक भी नहीं. पश्चिमी यूपी में हाईकोर्ट की खंडपीठ की मांग को दशकों हो गए. लेकिन मामला दो कदम भी आगे नहीं बढ़ पाया. हालात ये है कि, 13 जिलों के अधिकार क्षेत्र वाले लखनऊ में एक बेंच है. लेकिन पश्चिमी यूपी के करीब 22 जिलों की 8 करोड़ वाली आबादी में कोई बेंच नहीं है. जबकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट में लंबित 52 फीसदी केस पश्चिमी जिलों के हैं और इन मामलों की वजह से यहां के लोगों को इतनी दूर जाना पड़ता है.
पश्चिमी यूपी वालों के लिए लाहौर हाईकोर्ट पास है
न्याय की नीति होती है सरल और सुलभ न्याय समय से न्याय, दहलीज और दरवाजे पर न्याय. लेकिन पश्चिमी यूपी वालों के साथ हो रहा अन्याय को देखिए, यहां के लोगों को पाकिस्तान का लाहौर हाईकोर्ट उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट से पास पड़ेगा. क्योंकि,
मेरठ से लाहौर की दूरी करीब 427 किमी है
मेरठ से इलाहाबाद हाईकोर्ट की दूरी करीब 733 किमी है
सहारनपुर से इलाहाबाद हाईकोर्ट से दूरी 752 किमी
शामली 720 किमी, मुजफ्फरनगर 693, बिजनौर 692 और बागपत 670 किमी दूर है
कब से हो रही हैं बेंच की मांग?

पश्चिमी यूपी में बेंच का प्रश्न चार दशक से भी ज्यादा पुरानी है. लेकिन दावों और वादों के सिवा यहां के लोगों के मिला कुछ नहीं है. बता दें कि,
पश्चिमी यूपी में 1955 में खंडपीठ का ख्वाब देखा गया था
तत्कालीन सीएम संपूर्णानंद ने बेच की सिफारिश की थी
1976 में एनडी तिवारी सरकार ने भी प्रस्ताव भेजा था
1980 में बेंच की मांग के आंदोलन ने तेजी तो पकड़ी लेकिन सियासी सुस्ती से ये परवान नहीं चढ़ सकी.
किन राज्यों में कितनी कितनी बेंच हैं
जो लोग पहले से ही एक खंडपीठ होने की दलील देते हैं. ये आंकड़े उन्हें आइना दिखा सकते हैं.
करीब 22 करोड़ की आबादी पर यूपी में एक बेंच है
साढ़े 5 करोड़ वाले राजस्थान में 1 बेंच है, इस हिसाब से यूपी में 4 बेंच होनी चाहिएं
करीब 10-10 करोड़ की आबादी वाले एमपी-बिहार में दो-दो बेंच हैं
पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र तो हाईकोर्ट की तीन-तीन बेंच हैं
न्याय की नीति और आंकड़ों के लिहाज से पश्चिमी यूपी में बेंच का दावा जितना मजबूत है. शायद उतनी मजबूती से या तो पैरोकारी नहीं हुई या राजनीति और राजनेताओं ने प्राथमिकता नहीं दी. अब इस बार ‘बेंच नहीं तो वोट नहीं’ के नारे से के साथ आंदोलन ने तेजी पकड़ी है. वकीलों का कहना है कि, ये सवाल केवल हमारा नहीं 8 करोड़ जनता का हक है इसलिए सांसदों के घेराव बाद शीतकालीन सत्र के समय संसद भी घेरी जाएगी और 14 नवंबर को दिल्ली में प्रर्शन होगा.
