गणतंत्र दिवस और बीटिंग रिट्रीट का एक खास संबंध है. बीटिंग द रिट्रीट के बिना गणतंत्र दिवस अधूरा सा लगता है. हर साल 29 जनवरी के दिन राष्ट्रपति भवन में इस भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. इस दिन देश के राष्ट्रपति अपने खास बग्घी से निकलते हैं. जितना खास देश के लिए बीटिंग द रिट्रीट का कार्यक्रम होता है, उतना ही खास राष्ट्रपति की बग्घी भी है. आज आपको हम बतायेंगे कि आखिर खास क्यों है और इसकी अहमियत क्या है?
देश में हर साल गणतंत्र दिवस पर चार दिनों तक चलने वाला उत्सव बीटिंग द रिट्रीट के साथ समाप्त होता है. हर साल 29 जनवरी को बीटिंग द रिट्रीट कार्यक्रम के माध्यम से देश की सैन्य शक्ति, विरासत और समृद्धि देखने को मिलती है. गणतंत्र दिवस के तीन दिनों बाद का यह कार्यक्रम कई मामलों में महत्वपूर्ण है, हर साल 29 जनवरी के दिन शाम के समय बीटिंग द रिट्रीट कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है. इस कार्यक्रम में तीनों सेनाओं के सामूहिक बैंड एक साथ मिलकर धुन बजाते हैं और कार्यक्रम के अंत में सलामी और राष्ट्रगान के साथ राष्ट्रीय ध्वज को उतार लिया जाता है. बीटिंग द रिट्रीट कार्यक्रम के दौरान जिस बग्घी पर राष्ट्रपति सवार होते हैं, उसकी भी कहानी बड़ी रोचक है.
आजादी के बाद भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान कई चीजों का बंटवारा हुआ था, इसमें गवर्नर जनरल बॉडीगार्डस रेजीमेंट भी थी, हालांकि शांतिपूर्ण तरीके से इसका बंटवारा 2:1 के अनुपात में हो गया था लेकिन बात तब फंस गई जब मामला शाही बग्घी का आया. दोनों ही देश इस बग्घी को अपने पास ही रखना चाहते थे, ऐसे में गवर्नर जनरल बॉडीगार्डस के डिप्टी ने विवाद को सुलझाने को लेकर एक तरकीब निकाला. गवर्नर जनरल बॉडीगार्डस के डिप्टी जो पाकिस्तान जाने वाले थे उन्होंने तरकीब निकाला कि बग्घी के लिए टॉस किया जाएगा, और फैसला जिसके पक्ष में आएगा, बग्घी उसी की हो जाएगी. दोनों पक्ष इस तरकीब को लेकर राजी हो गए वायसराय के अंगरक्षक ने सिक्का उछाला, सबकी निगाहें आसमान से धरती की ओर वापस आ रहे सिक्के पर थी. सिक्के ने भारत के पक्ष में निर्णय दिया, इसके साथ ही भारत ने इस बग्घी को टॉस के आधार पर हासिल कर लिया. उसी दिन से यह खास सोने से सजी बग्घी, भारतीयराष्ट्रपतियों की शान बढ़ाती रही है.

राजेंद्र प्रसाद ने शुरू की थी यह परंपरा
बग्घी पर बैठने की परंपरा साल 1950 में देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने शुरू की, तब से यह गणतंत्र दिवस के सामपन पर परंपरा के तौर देश की शान बढ़ाने लगी. देश के राष्ट्रपति की शान बढ़ाने वाला यह बग्घी जितना खास है उतने ही खास है इस बग्घी में लगने वाले 6 घोड़े. असल में ये घोड़े भारतीय और ऑस्ट्रेलियाई घोड़ों की मिक्स ब्रीड है,
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ये घोड़े आम घोड़ों की तुलना में ज्यादा फिट और ऊंचे भी होते हैं. साल 1950 से बीटिंग रिट्रीट की जो परंपरा शुरू हुई वो करीब हर साल 29 जनवरी को होती है, लेकिन कुछ समय बाद ही सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए इस चलन को बंद करना पड़ा, इसके बाद देश के राष्ट्रपति बुलेट प्रूफ गाड़ियों में कार्यक्रम के दौरान बैठने लगे, असल में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की मौत के बाद यह फैसला लिया गया, जिसके बाद करीब 20 साल तक बग्घी को उपयोग में नहीं लाया गया. लेकिन 2014 में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने कार्यकाल में एक बार फिर से इस परंपरा को शुरू करवाया और हर साल 29 जनवरी को कार्यक्रम के दौरान फिर से बग्घियों में सवारी होनी शुरू की गई.
