लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2022 में विधानसभा के चुनाव होंगे लेकिन उससे पहले उत्तरप्रदेश की रणभूमि में तमाम राजनीतिक दलों की रणनीति को तोलने का तराजू तैयार है. प्रदेश में13 सीटों पर होने वाले विधानसभा के उपचुनाव चुनाव की रणभेरी बज चुकी है. फिलहाल हमीरपुर की सीट से उपचुनाव का आगाज हो रहा है. यहां 23 सितंबर को मतदान और 27 को मतगणना होगी बता दें कि, ये सीट बीजेपी के विधायक अशोक चंदेल को एक मामले में सजा और उनकी सदस्यता रद्द होने के बाद खाली हुई है. सपा-बसपा अपने- अपने प्रत्याशी तय कर रहे हैं लेकिन बीजेपी ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं.
बहन जी फिर सोशल इंजीनियरिंग के सहारे
अब उपचुनाव को लेकर सियासी दलों के दम-खम को देखें तो हाथी की चाल थोडी ज्यादा तेज दिख रही है. मुस्लिम और ब्राह्मण उम्मीदवारों की सोशल इंजीनियरिंग की इबारत पर बसपा सुप्रीमो मायावती ने विरोधियों को अपने इरादे जता दिए हैं. मायावती ने सबसे पहले अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं. राजनीतिक पंडित इसे मायावती का माइंड गेम बता रहे हैं. एक्सप्रट बताते हैं कि. सपा से गठबंधन टूटने के बाद मायावती जताना चाहती हैं कि, वो कमजोर नहीं है. और हर लड़ाई के लिए तैयार है. वैसे भी मायावती को बीजेपी के बजाए समाजवादी पार्टी से बेहतर प्रदर्शन करने की चुनौती है. 2007 में बसपा ने दलित-मुस्लिम और ब्राह्मण उम्मीदवारों के सहारे सोशल इंजीनियर करके सत्ता का स्वाद चखा था. तभी से बसपा सुप्रीमो मयावती को ये फॉर्मूला कारगर लगता रहा है. सियासी दौड़ में हाथी जब-जब हारा है उसके तुरंत बाद मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग के रास्ते को ही पकड़ा है.इस उपचुनाव में भी मायावती ने 12 सीटों में से आधे पर जहां मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं वहीं आधी सीट पर ब्राह्मण प्रत्याशियों का पत्ता चला है. बहन जी जानती है कि, दलित वोट तो आएगा ही साथ ही मुस्लिम या ब्राह्मण वोटों के गणित में उनके उम्मीदवार का रिजल्ट अच्छा रह सकता है.
साइकिल की ‘ओवरहॉलिंग’ में लगी सपा
अखिलेश यादव के लिए गठबंधन का अनुभव ज्यादा अच्छा नहीं रहा है. 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का गठबंधन हुआ. लखनऊ में अखिलेश यादव और राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में इश गठबंधन को गंगा-यमुना का संगम बताया गया. दोनों नेताओ ने साथ में रोड शो और रैलियां भी की लेकिन ‘दो अच्छे लड़कों’ की ये जोड़ी कोई कमाल नहीं कर पाई. यूपी में भारी बहुमत से बीजेपी की सरकार बनी और दोनों दलों के बीच दरार आ गई गठबंधन ऐसा टूटा कि, इसकी दरार मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में भी देखी गईं. एक और ऐतिहासिक घटना तब घटी जब उत्तर प्रदेश में दो विरोधी दल सपा और बसपा ने 25 साल पुरानी अदावत को भुलाकर मुहब्बत का मंच सजाया. 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने साथ लड़ने का फैसला किया, इस गठबंधन को सफलता का 100 फीसदी बंधन माना जा रहा था लेकिन सारे कयास, दावे और आंकड़े औंधे मुंह आ गिरे यूपी की 80 लोकसभा सीटों में बसपा को 10 और सपा को केवल 5 सीटें मिली. दोनों दलों के बीच वही हुआ जो कांग्रेस और सपा के गठबंधन का हुआ था. बल्कि उससे भी ज्यादा तल्खी देखने को मिली. चुनाव के बाद मायावती ने गठबंधन की हार का ठीकरा समाजवादी पार्टी के सिर फोड़ दिया और ये कहकर अलग हो गईं कि, इनके तो परिवार के लोग भी हार गए. इनके वोटरों ने इनका साथ नहीं दिया हमारे वोटर ना होते तो 5 सीट भी नहीं आतीं. उसी सदमे से उबरने और उपचुनाव के ट्रैक पर उतरने से पहले अखिलेश यादव अपनी ‘साइकिल’ की ओवरहॉलिग में लगे हैं. बूंद-बूद से घड़ा भरने के भरोसे में अखिलेश यादव छोटे-छोटे दलों को साथ लेकर चलने की रणनति बना रहे हैं.ओमप्रकाश राजभर भी उनकी साइकिल पर सवार हो सकते हैं. मुलाकात हो चुकी है. हाल ही सपा के 3 राज्यसभा सांसद सपा छोड़ बीजेपी में शामिल हुए हैं तो वहीं अखिलेश यादव ने दूसरे दलों के नेताओं के लिए अपने खिड़की दरवाजे खोल दिए हैं. फूलन सेना के अध्यक्ष के अलावा बसपा सरकार में मंत्री रहे भूरेराम और उनके समर्थकों को पार्टी में शामिल कराया है. किसान एप के जरिए अखिलेश यादव ने जता दिया है कि, वो इस चुनाव में गांव-गरीब किसान, बेरोजगार के मुद्दे पर मैदान में उतरेंगे. अभी तक उन्होंने दो ही सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं. लोकसभा चुनाव में हाथी की साथी रही साइकिल के सामने इस उपचुनाव में हाथी से आगे निकलना बड़ी चुनौती है. हां अघर शिवपाल यादव की पार्टी इस उपचुनाव के समर में नहीं उतरी तो अखिलेश यादव के लिए बड़ी राहत की बात होगी और इसका फायदा समाजवादी पार्टी बखूबी उठा भी लेगी.
बीजेपी का जोश HIGH
इन हालात में बीजेपी का जोश एकदम हाई है. उपचुनाव से पहले मंत्रिमंडल विसातर में जातीय समीकरण के जरिए बीजेपी ने अपनी बिसात बिछा दी है. वहीं सभी मंत्रियों को जिलों का प्रभारी बनाकर उपचुनाव फतह की जिम्मेदारी दी है. हालांकि, उम्मीदवारों का ऐलान होना अभी बाकी है. उसके लिए भी जिताऊ और जमीनी नेताओं पर नजर जमी हुई है. लेकिन सत्ताधारी बीजेपी के सामने विपक्ष की तरह संकट नहीं दिख रहा है.मौजूदा समय में बीजेपी प्रदेश में पहले पायदान पर है. विधानसभा चुनाव भी 2022 में होने हैं ऐसे में बीजेपी के लिए पहले पायदान की लड़ाई में ही नहीं है. अपने मंत्रिमंडल विस्तार में सभी जातियों को प्रतिनिधित्व देकर सीएम योगी ने भी जता दिया कि, सबका साथ सबका विकास वाली विसात पर वो इस उपचुनाव के लिए भी तैयार हैं. उपचुनाव की इन 13 सीटों में से 11 पर पहले का कब्जा था इनमें एक सीट सपा और एक बसपा के पास थी.
अनुप्रिया और ओमप्रकाश राजभर पर नजर, कांग्रेस असमंजस में,
उत्तर प्रदेश में उपचुनाव का रिंग सजकर तैयार हो गया है. लेकिन इस लड़ाई में कांग्रेस अभी तक कहीं दिखाई नहीं दे रही है. नेतृत्व से निराश कार्यकर्ताओं में भी कोई हलचल कहीं दिखाई नहीं दे रही है. लोकसभा चुनाव के कई महीनों तक राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर खींचतान रहीं तो वहीं उत्तर प्रदेश में भी अभी नेतृत्व को लेकर पार्टी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पा रही है. लोकसभा चुनाव से पहले प्रदेश के पश्चिमी प्रभारी ज्योतिरादित्य सिंधिया तो चुनाव के बाद कहीं दिखाई ही नहीं दिए. प्रियंका गांधी ही प्रदेश में किसी ना किसी मुद्दे पर थोड़ा सक्रिया दिखाई दे रही है. लेकिन उपचुनाव को लेकर कांग्रेस की कोई तैयारी नहीं दिख रही हैं. इनके अलावा प्रदेश में जिन दलों और चेहरों पर नजर जमी है उनमें एक दल है बीजेपी की सहयोगी अपना दल और एक दल बीजेपी से बगावत कर चुके ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव पार्टी. अनुप्रिया पटेल की सीट पर बीजेपी अपना उम्मीदवार उतार चुकी है ऐसे में अनुप्रिया पटेल के एक्शन और रिएक्शन पर सबकी नजर होंगी. तो वहीं ओमप्रकाश राजभर भी उपचुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं. बीजेपी जहां दलित ओबीसी वोटों की बिसात पर पूर्वांचल वाली सीटों पर समीकरण सिद्ध करने की जुगत लगा रही है वहीं राजभर इस खेल को बिगाड़ने की कोशिश करेंगे. लेकिन दावे और दांव-पेंच के बीच सवाल ये है कि, आखिर किसमें कितना है दम?
