आज है अहोई अष्टमी, संतान प्राप्ति और सुख समृद्धि के लिए शुभ मुहूर्त में करें मां की अराधना

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नई दिल्ली : 27 अक्टूबर को देशभर में पतियों के लिए दिनभर निर्जल व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए 31 अक्टूबर को एक खास दिन है. मां गौरी से अपने सिंदुर की रक्षा का वरदान मांगने के बाद देशभर की महिलाएं 31 अक्टूबर को अपने बच्चों की सेहत, सुरक्षा और लंबी आयु के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखेंगी.

मुख्यतः यह त्योहार उत्तर भारत में मनाया जाता है. करवाचौथ की तरह की इस दिन भी देवों के देव महादेव की पत्नी पर्वती की अराधना का विधान है.

दिवाली से आठ दिन पहले रखा जाता है व्रत
अहोई अष्टमी व्रत की खास बात ये है कि यह त्योहार करवाचौथ के ठीक 4 दिन बाद और दिपों के त्योहार दिवाली से महज 8 दिन पहले मनाया जाता है. हिंदू पंचाग के मुताबिक कार्तिक मास की कृष्‍ण पक्ष अष्‍टमी को अहोई अष्टमी कहरकर पुकारा जाता है. पौराणिक मान्यता है कि जो भी महिला इस दिन व्रत रखकर मां पार्वती की अराधना करती है, उसकी संतान की दीर्घायु प्राप्त होती है. हिंदू ग्रंथों के अनुसार, अहोई अष्टमी का व्रत हर उस महिला को रखना चाहिए, जिसकी संतान न हो.

कहा जाता है कि शादी के लंबे समय बाद भी इस जोड़े को संतान की प्राप्ति न हो वह अगर विधि-विधान से अहोई अष्टमी का व्रत रखें और सूरज ढलने के बाद मां पार्वती की अराधना करे, उसके घर में जल्द ही किलकारियां गूंजने लगती हैं.

पूजा का शुभ मुहूर्त
ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक, इस वर्ष अहोई अष्टमी बहुत ही शुभ मुहूर्त में पड़ रही है. अहोई अष्टमी सुबह 11 बजकर 07 मिनट से प्रारंभ है और 1 नवंबर की सुबह 9 बजे तक रहेगी, यानि की इस वर्ष अष्टमी का व्रत 24 घंटे से भी कम समय का है. अहोई अष्टमी की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त शाम 5 बजे से शाम को 7 बजे तक का है.

तारों को दिया जाता है अर्घ्‍य
अहोई अष्टमी के दिन एक मां अपनी संतान की खुशहाली के लिए पूरे दिन निर्जला व्रत रखती है. पूरा दिन कठोर व्रत रखने के बाद सूर्य ढलने के बाद महिलाएं परिवार की बाकि महिला सदस्यों के साथ मां पार्वती की व्रत कथा सुनती हैं और फिर आसमान में तारों के उगने का इंतजार करती हैं. कुछ जगहों पर यह व्रत चांद को अर्घ्‍य देकर पूरा किया जाता है, तो कुछ जगहों पर यह व्रत तारों को अर्घ्‍य देकर संपन्न होता है.

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