हाशिमपुरा की पूरी कहानी: 1 रात 42 कत्ल और इंसाफ के 31 साल

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नई दिल्ली/मेरठ: देश दुनिया को हिलाकर रख देने वाले मेरठ के हाशिमपुरा कांड में 31 साल बाद बड़ा फैसला आया है. दिल्ली हाई कोर्ट ने 22 मई 1987 के 42 मुस्लिम युवकों की हत्या के मामले में सभी 16 पीएसी के जवानों को उम्रकैद की सजा सुनाई है. बता दें कि, 2015 में दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने सभी 19 आरोपी जवानों को बरी कर दिया था. तब मारे गए लोगों के परिवारों की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी और अब अपने फैसले में हाईकोर्ट ने सभी को हत्या, अपहरण और सबूत मिटाने का दोषी मानते हुए ये सजा सुनाई है. कोर्ट ने सभी को 26 नवंबर तक सरेंडर करने का आदेश दिया है.

क्या हुआ था उस रात?
ईद आने वाली थी,चांद दिखने वाला था, ईद से मात्र 3 दिन पहले 21-22 मई की रात पीएसी के जवान तलाशी अभियान के नाम पर करीब 50 लोगों को ट्रक में भरकर ले गए थे. मेरठ से ले जाकर गाजियाबाद की हिंडन नदी और मुरादनगर की गंगनहर किनारे गोलियां मारकर नहर में फेंकने का आरोप है.

उस रात की कहानी चश्मदीदों की जुबानी
22 मई 1987 का वो मंजर याद करते ही यहां के रहने वालों की आंखे डबडबा जाती हैं. इस घटना में किसी ने बेटा खोया किसी ने पति किसी ने भाई तो किसी ने पिता, लेकिन इस हादसे में करीब 5 लोग गोली लगने के बाद भी जिंदा बच गए थे. उस हादसे में मौत को मात देने वाले जुल्फिकार ‘अपना उत्तर प्रदेश’ से बात करते हुए बताते हैं कि,30 साल की लड़ाई की मेहनत आज रंग लाई है. उस रात की घटना बताते हुए वह कहते हैं, ‘एक-एक कर लोगों को ट्रक से उतारा गया और गोलियां मारी गईं. उस रात मुझसे पहले 2 लोगों की गोली मारी, फिर मुझे गोली मारी और नहर में फेंक दिंया. गोली मुझे छूते हुए निकल गई. मैं नदी के किनारे झाड़ियों में जा गिरा और चुपचाप पड़ा रहा और रात के अंधेरे वहीं से निकला था और लिंक रोड़ पुलिस को जाकर सारी कहानी बताई.’

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इस घटना के चश्मदीद उस्मान बताते हैं कि, ‘गोली मारने के बाद मुझे गंग नहर में फेंक दिया गया था किस्मत अच्छी थी जो बच गया लेकिन हालात से आजतक लड़ रहा हूं’ हाशिमपुरा निवासी जैबुननिशां अपना ‘उत्तर प्रदेश’ को बताती है कि, इस हादसे में पति को खो दिया बड़ी परेशानी से परिवार को पाला है.

यहीं की रहने वाली नसीमा की आंखे ये कहते कहते डबडबा जाती है कि, उस हत्याकांड में मारा गया मेरा इकलौता भाई था, भाई के मरने के बाद पिता बी जी ना सके मां पागल हो गई थी. हाशिमपुरा हत्याकांड के वक्त गाजियाबाद में एसपी रहे एक वरिष्ठ अधिकारी कहते है कि, इस घटना को बुलाया नहीं जा सकता दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

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मेरठ के हाशिमपुरा हत्याकांड के समय गाजियाबाद में पुलिस अधीक्षक रहे विभूति नारायन राय ने कहा कि इस घटना और बाबरी प्रकरण को तब तक नहीं भुलाया जा सकता, जब तक दोषियों को सजा नहीं मिल जाती

हाशिमपुरा के हिस्से में क्यों आए ये हालात?
दरअसल, फरवरी 1986 में तत्कालीन केंद्र सरकार ने अयोध्या में विवादित स्थल का ताला खोलने का आदेश दिया था. तब यूपी में हालात बिगड़े तो मेरठ भी उसकी आग से नहीं बच सका. मई महीने में माहौल ज्यादा बिगड़ा तो कर्फ्यू लगना पड़ा था.

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इंसाफ के 31 साल
देर से ही सही हाशिमपुरा के लोगों को इंसाफ तो मिला. यही सुकून उन तमाम चेहरों पर दिखाई दिया जो इस हादसे से प्रभावित हुए थे. हालांकि, मामला अभी सुप्रीम कोर्ट ज सकता है इसलिए इंसाफ की लड़ाई अभी और लंबी भी हो सकती है.

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