लखनऊः लोकसभा चुनाव में जीत दर्ज कराने के लिए हर कोई अपना दांव खेल रहा है. जैसा की सब जानते ही है कि लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा सूबा है. यूपी में सबसे ज्यादा सीटें होने की वजह से पार्टियों का ध्यान सबसे ज्यादा इसी प्रदेश पर होता है और हो भी क्यों न सबसे ज्यादा सीटे भी इसी प्रदेश में है. कहा भी जाता है कि अगर लोकसभा चुनाव में अपने नाम का डंका बजाना है तो यूपी की ज्यादा से ज्यादा सीटों अपने नाम करनी होती है. दिल्ली की गद्दी पाने का सीधा रास्ता यूपी से होकर ही निकलता है लेकिन ये रास्ता किसी ठेढ़ी खीर से कम नहीं है.
सभी पार्टियां इस सीट पर अपना जोर अजमाने से पीछे नहीं हटती है, सभी पार्टियों का सीट पर हमेशा ही अपना सबसे दमदार उम्मीदवार उतरने का रिकार्ड रहा है. और इस बार लोकसभा चुनाव में जहां सपा-बसपा गठबंधन के साथ मैदान में उतर रहे है तो वहीं पिछले लोकसभा चुनाव और यूपी विधानसभा चुनाव में सबसे बड़ी तेज दर्ज कराने वाली बीजेपी भी यूपी में अपनी पुरानी जीत को दोहराना चाहती है. वहीं कांग्रेस भी यूपी में अपने वनवास को खत्म करना चाहती है जिसके लिए वो हर तिकड़म आज़मा रही है.
जहां कांग्रेस ने अपनी कमर कस ली है तो वहीं बहुजन समाज पार्टी की मुखिया मायावती भी अपना पुराना दांव खेलने के लिए तैयार है. वैसे तो अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी ने इस बार लोकसभा चुनाव में जीत के लिए गठबंधन का रास्ता चुना है. तो वहीं बहुजन समाज पार्टी ने 3 मार्च को तकरीबन डेढ़ दर्जन लोकसभा प्रभारियों के नामों पर मुहर लगा दी है। हालांकि अभी बहुजन समाज पार्टी ने फाइनल लिस्ट जारी नहीं की है लेकिन प्रभारियों के नामों पर सहमति बन चुकी है.
जिसे देखने के बाद ये साफ हो गया है कि मायावती एक बार फिर लेकसभा चुनाव में अपना TRUMP CARD खेलने का मन बना चुकी है. आम चुनाव 2019 के लिए बसपा सुप्रीमो ने अभी तक जितने भी लोकसभा प्रभारी घोषित किए हैं, उनमें सबसे बड़ी तादाद ब्राह्मण समुदाय के नेताओं की हैं. बसपा में माना जाता है कि जिन्हें लोकसभा प्रभारी बनाया जाता है, वही उम्मीदवार होते हैं. बसपा के लिए पश्चिम यूपी की तुलना में पूर्वी उत्तर प्रदेश थोड़ा कमजोर माना जाता है. ऐसे में मायावती ने ब्राह्मण कार्ड खेलकर बड़ा दांव चला है.
दरअसल उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण कार्ड चलने के पीछे बसपा सुप्रीमों अपनी पहली रणनीति पर ही काम रही है. जिसे वो पहले आजमा चुकी है और जिसमें उनकों कामयाबी भी हाथ लग चुकी है. आपको बता दें कि 2007 के यूपी विधानसभा चुनाव और 2009 के लोकसभा चुनाव में बसपा प्रमुख मायावती ने दलित-ब्राह्मण गठजोड़ का बड़ा खेल खेला था और जिसका फायदा भी खूब हुआ था..इसी रणनीति की बदौलत मायावती ने यूपी के सिहांसन को संभाला था और इस बार भी मायावती कुछ ऐसा ही करना चाहती है. तभी तो उन्होनें पूर्वांचल में कांग्रेस-बीजेपी की काट के लिए बहुजन समाज पार्टी ने ब्राह्मणों पर एक बार फिर बड़ा दांव खेला है.
अगर बात पूर्वी यूपी की हो रही हो तो आपको बता दें कि पूर्वी यूपी में ब्राह्मण और ठाकुरों के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई जग-जाहिर है, जो हर चुनाव में देखने को मिल ही जाती है. हालांकि मोदी लहर में ये लड़ाई फीकी पड़ गई थी. बीजेपी के सत्ता पर काबिज होने के और सीएम योगी को प्रदेश की कमान थमाने के बाद मायावती को ये उम्मीद है कि वो इस बार ब्राह्मणों को अपने पाले में ला सकती हैं. दरअसल सीएम योगी राजपूत समुदाय से आते हैं. सीएम योगी के यूपी की कमान संभालने के बाद ब्राह्मण समाज बीजेपी से खफा है. ऐसे में यूपी में ब्राह्मण वोटो को अपने पाले में लाने की दौड़ तेज हो गई है. बसपा का पूर्वांचल की ज्यादातर सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार पर दांव लगाना इस दौड़ का हिस्सा है. बहुजन समाज पार्टी को इस खींचतान का फायदा होना भी लाज़मी है.
सत्ताधारी बीजेपी के अलावा कांग्रेस ने भी अपना सारा दम यूपी में लगा रखा है. कांग्रेस यूपी में अपनी जीत के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रही है. गठबंधन में शामिल न किए के बाद कांग्रेस ने अपने हुकुम इक्के को लोकसभा चुनाव में उतारा है. कांग्रेस ने पूर्वाचंल में अपनी पैठ जमाने के लिए पूर्वी यूपी महासचिव की कमान प्रियंका गांधी वाड्रा को सौपीं है. फिलहाल तो लोकसभा चुनाव में ये देखना दिलचस्प होगा कि क्या ब्राह्मण कार्ड बहुजन समाज पार्टी के जीत का सपना पूरा करता है या एक बार फिर बीजेपी ब्राह्मण कार्ड को अपने पाले में शामिल कर लेगीं.
