सपा के यादव वोट पर PM मोदी की नजर, बिगाड़ेंगे ‘MY’ समीकरण!

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दिल्ली/लखनऊ:  पीएम मोदी की वो सियासी शैली है, कि, विपक्ष जहां सोचना बंद कर देता है.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां से काम शुरू करते हैं और इस बार ताजा उदाहरण है, हरमोहन सिंह यादव की पुण्यतिथि वाले प्रोग्राम में पीएम नरेंद्र मोदी की हिस्सेदारी।

यादव वोटबैंक को बड़ा संदेश
दरअसल, मुलायम सिंह की सियासत के सारथी रहे पूर्व राज्यसभा सांसद चौधरी हरमोहन सिंह यादव और उनका पूरा परिवार समाजवादी पार्टी का खास रहा है. 2012 में उनके निधन के बाद भी मुलायम सिंह परिवार की नजदिकियां रही हैं. लेकिन इस बार हरनाम सिंह यादव की पुण्यतिथी में प्रधानमंत्री का यूं शिरकत करना यादव वोटबैंक के लिए किसी बड़े संदेश से कम नहीं है. इस कार्यक्रम का हिस्सा बन यादवों के मन में बीजेपी के झुकाव के अंकुर तो डाल ही दिए।

UP में यादव वोट बैंक की राजनीति
पीएम मोदी की रणनीति और यादव वोट बैंक की राजनीति को देखें तो, यादवों की आबादी करीब 9 फीसदी है. ओबीसी वोटों की बिसात पर ये आंकड़ा करीब 20 फीसदी है. वहीं यादवों की दो उपजातियों में एक कमेरिया यादव हैं जिससे मुलायम सिंह आते हैं और इनका आंकड़ा करीब 25% हैं. वहीं दूसरे घोसी यादव है जिनकी आबादी करीब 75 फीसदी है. हरमोहन सिंह यादव घोसी से ताल्लुक रखते हैं. ऐसे में हरमोहन सिंह के जरिए बीजेपी अब सपा के यादव वोटबैंक में सेंध लगाने की तैयारी कर रही है।

यादव वोट बैंक में  BJP की सेंध!
सपा की इस सियासी पूजीं में बीजेपी पहले से ही सेंध लगा चुकी है. 2014, 2017 और 2019 के चुनाव में यादव बेल्ट की कई सीटों पर कमल खिलाया था.योगी 2.0 वाली सरकार में भी यादव बेल्ट की 59 में से 44 सीटें बीजेपी को मिलीं. अब 2024 की बिसात पर यादव वोटबैंक को सहेजने और साधने में कोई कसर नही छोड़ना चाहती है बीजेपी।

मोदी का दांव, अखिलेश को तनाव!

हरमोहन सिंह यादव के बेटे सुखराम सिंह यादव पीएम मोदी से मुलाकात भी कर चुके हैं, योगी सरकार की भी तारीफ लगातार करते रहे हैं. उनके बेटे मोहित यादव बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. यादवों को लेकर बीजेपी का प्लान देखें तो संगीता यादव को राज्यसभा भेजना, दिनेश लाल यादव का आजमगढ़ से जीतना और अब हरमोहन सिंह यादव की पुण्यतिथि के जरिए पीएम मोदी का संदेश और बहुत मुखर होगा.वहीं सैफई कुनबे की कलह और सपा में आपसी संकट के बीच सवाल ये है कि, क्या यादव वोट बैंक को सहेजना अखिलेश यादव के लिए अब बड़ी चुनौती होगा. अगर ऐसा हुआ तो अखिलेश यादव के लिए मुस्लिम वोटों को सहेजना भी मुश्किल होगा।

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