नई दिल्लीः शास्त्रों के अनुसार अश्विन मास की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा के नाम से जाना जाता और हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार इस पूर्णमा का विशेष महत्व है. इस दिन लोग माता लक्ष्मी की पूजा करके उपवास करते है और अपने परिवार की खुशहाली सहित धन्य-धान्य की कामना भी करते हैं. इस बार शरद पूर्णिमा का त्योहार 24 अक्टूबर को मनाया जाने वाला है. धार्मिक मान्यता अनुसार इस दिन चांद की चांदनी से अमृत बरसता है और इसीलिए लोग चांदनी रात में अपने घरों की छतों पर खीर रख देते है और उसे प्रसाद के रुप में ग्रहण कर खुद को धन्य मानते हैं.
चांदनी रात में खीर रखने का विशेष महत्व
शास्त्रों के अनुसार इस दिन चांद की रोशनी अमृत वर्षा करती है यानि कि शरद पूर्णिमा के दिन चांद की किरणें विशेष गुणों से युक्त हो जाती है जिसमें कई बीमारियों का नाश करने की क्षमता होती है इसी वजह से लोग चांद की रोशनी में अपनी छतों के ऊपर खीर बनाकर रख देते है जिससे कि चांद की किरणें खीर पर पड़ सकें. उसके बाद दूसरे दिन लोग इस खीर को प्रसाद के रुप में ग्रहण करते हैं.
जानिए भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी मान्यता
इसके साथ ही ऐसी मान्यता भी है कि इस दिन माता लक्ष्मी रात में ये देखने के लिए निकलती है कि कौन सो रहा है और कौन जग रहा है और उसी के अनुसार वो उसका कल्याण करती है. ज्योतिषाचार्यों के अनुसार माता लक्ष्मी इस दिन जिसको जागता हुआ पाती है उसका कल्याण करती है और जो उन्हें सोता हुआ मिलता है उसके पास वो कभी भी ठहरती नहीं है. वहीं शास्त्रों में इस बात का भी जिक्र किया गया है कि इस दिन भगवान श्री कृष्ण ने गोपियों के साथ रास रचाया था.

क्या है खीर खाने का मनोवैज्ञानिक पहलू
शास्त्रों के अनुसार जहां खीर खाने को अमृतमयी बताया गया है तो वहीं इसे मनोवैज्ञानिक रुप से भी जोड़कर देखा गया है. ऐसा माना जाता है कि यही समय है जब मौसम में परिवर्तन होता है और ठण्ड के मौसम की शुरुआत होती है.
करें इस मंत्र का जाप
ऐसा कहा जाता है कि चांदनी रात में लगभग रात्रि 9 से 12 बजे तक खीर को किसी चीज से ढककर रख देना चाहिए और इसका सेवन करने से पहले 21 बार ॐ नमो नारायणाय का जाप करना चाहिए.
प्रेम के लिए जानी जाती है शरद पूर्णिमा की रात
कहा जाता है कि ये रात्रि प्रेम के लिए भी जानी जाती है. जब बात प्रेम की हो तो बांके बिहारी नटवर लाल माखनचोर कन्हा का जिक्र आ जाता है. बांके बिहारी की नगरी मथुरा और वृंदावन के लिए ये त्यौहार विशेष होता है. क्योंकि इसी दिन बांके बिहारी ने यमुना के तट के पास गोपियों और राधारानी के साथ महा रास खेला था. प्रेम की अद्धभुत परिभाषा को इसी पर्व पर इसी नक्षत्र में बांके बिहारी ने गढ़ा था. कहा जाता है कि ये गोपियां प्राचीनकाल के ऋषि महार्षि थे. जिन्होने सैकड़ों साल तक तपस्या की थी. इसके परिणाम स्वरूप भगवान ने इनका अपने प्रेम का रसपान करने का वचन दिया था. इसके लिए उन्होने इन सभी के साथ महारास करने का निश्चय किया. जिसके बाद शरद पूर्णिमा की पावन रात में चंद्रमा की ज्योत्सना के रस से सराबोर होकर रात भर महारास कर इन्हे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन दिया.
कहा जाता है आज की रात भी भगवान श्री कृष्ण व्रज की धरती पर आते हैं. इसके साथ ही उनकी बंशी की धुन पर सारी गोपिया प्रकट होती हैं. फिर श्रृष्टि के अनुपम लीला महारास का उदय होता है.
इन बातों का रखें खास ध्यान
1- अगर आपके शरीर की इंन्द्रियां शिथिल हो गई हैं तो इस दिन आप चंद्रमा की रोशनी में रखी हुई खीर को खाएं . इससे आपकी इन्द्रियां उर्जावान हो उठेंगी.
2- कहा जाता है कि शरद पूर्णिमा के दिन चंद्र देव और माता लक्ष्मी की आराधना के साथ देव वैद्यराज अश्विनी कुमारों का भी पूजन करने से आपकी इन्द्रियों में ओज और तेज बना रहता है.
3- अगर आपकी आंखों की रोशनी कम होती जा रही है तो इस दिन चंद्रमा को देखें 15 से 20 मिनट देखने के बाद आपको अपनी आंखों में फर्क आयेगा.
4- अस्थमा के मरीजों के लिए ये रात वरदान से कम नहीं होती है. इस दिन चंद्रमा की ज्योत्सना में इन्हें रहना चाहिए और चांदनी में रखी खीर का सेवन करना चाहिए . इससे इनको अस्थमा में विशेष लाभ मिलेगा.
5- कहते हैं कि ज्वार और भाटा चंद्रमा की गतिविधियों के कारण होते हैं. यानी चंद्रमा का जल पर और उनके स्वभाव पर राज होता है. ऐसे में हमारे शरीर में मौजूद जलीय तत्वों पर भी चंद्रमा की ये दशा लाभ पहुंचने में सहायक होगी.
6- शरद पूर्णिमा के दिन कामक्रीड़ा नहीं करनी चाहिए वरना संतति है कि संतान अपंग या बिमार पैदा होती है.
7- शरद पूर्णिमा की रात्रि में चंद्रमा की रौशनी में सूई में धाना डालने से आंखों की रोशनी बढ़ती है.
