लखनऊ/नई दिल्ली : उत्तर प्रदेश गोरखपुर के हत्या मामले के दोषी को उसकी सज़ा पूरी होने से पहले ही मुक्त किये जाने के राज्यपाल राम नाईक के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया. कोर्ट ने प्रतिक्रया देते हुए कहा कि राज्यपाल के इस निर्णय ने कोर्ट की चेतना को झकझोर के रख दिया. इसकी वजह से ही कोर्ट को इस मामले में दखल देना पद रहा है.
दोषी को सुनाई गई थी उम्र कैद की सजा
कोर्ट के मामलों में मन मुताबिक फेर बदल नहीं किया जा सकता और यह ऐसा ही मामला प्रतीत हो रहा है. मामले में जस्टिस एनवी रमन और जस्टिस एमएम शान्तनागोडर की अध्यक्षता में पीठ ने कहा कि दोषी को उम्र कैद की सज़ा हुई थी. तो फिर क्या कारण है कि सिर्फ सात साल की सज़ा काटने के बाद ही दोषी को छोड़ने का फैसला लिया गया? क्या मामले की गंभीरता से जांच भी नहीं की गयी? अगर जांच की गयी होती तो यह फैसला नहीं लिया जाता.इससे ज़ाहिर है कि गैर-ज़िम्मेदाराना रवैया दिखाते हुए फैसला लिया गया है.

अधिकारों के प्रयोग पर भी उठाया सवाल
बता दें कि इस मामले में मार्कंडेय शाही की याचिका ख़ारिज करते हुए कोर्ट ने इस पर हैरानगी जताई और कहा कि कैसे राज्यपाल ने अपने संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग किसी ऐसे अपराधी को मुक्त करने के लिए किया जोकि चार हत्याओं का दोषी है और कोर्ट से मिली सज़ा काट रहा है.
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सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह फैसला राज्यपाल द्वारा तब लिया गया जबकि दोषी की सज़ा के खिलाफ मामला हाईकोर्ट में चल रहा है. शाही के वकील अमरेंद्र शरन ने दलील दी है कि राज्यपाल इस फैसले के लेने का कारण बताने के लिए बाध्य नहीं है. लेकिन उनकी इस दलील से कोर्ट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा.कोर्ट ने मामले में आरोपी के बारे में बताते हुए कहा कि दोषी ज़मानत पर बाहर था तभी उसने चार अलग-अलग आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया.हालांकि शाही के वकील ने दोषी मार्कंडेय के स्वास्थ्य ख़राब होने की बात भी कोर्ट में कही.लेकिन कोर्ट ने इस पर भी ध्यान दिए बिना संगीन मामले में आरोपी पर कड़ी प्रतिक्रया दी.
क्या है पूरा मामला
बता दें कि उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक ने सितम्बर 2017 में मार्कंडेय शाही की सज़ा माफ़ कर दी थी. जिस पर कोर्ट ने कड़ा रुख दिखाते हुए राज्यपाल के इस फैसले को संवैधानिक अधिकारों का दुरुपयोग बताकर राज्यपाल के फैसले को पलट दिया.
