समाजवादी पार्टी/सैफई परिवार में फिर दरार खींची है. पिछली बार की दरार अब खाई बनी तो ‘चाचा शिवपाल यादव’ ने‘भतीजे अखिलेश यादव’ से अलगा रास्ता अपना लिया.इस बार लड़ाई ‘साइकिल’ पर दावे की तो नहीं है लेकिन साइकिल के मुकाबले की जरुर है. शिवपाल यादव अपने सेक्युलर मोर्चा के लिए साइकिल के मुकाबिल रेंजर साइकिल या उसके जैसा ही कोई चुनाव चिन्ह पाने की जुगत में हैं.
सपा मुखिया अखिलेश यादव को भले ही ‘समाजवादी साइकिल’ बड़ी आसानी से मिल गई. उनके खुद के पास भी ब्रांडेड साइकिलें हैं जिनसे वो सैर-सपाटे पर भी जाते हैं. लेकिन मुलायम सिंह को इस साइकिल के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी. क्या आपको पता है कि, मुलायम सिंह यादव को साइकिल के लिए क्या करना पड़ा..उन्हें पहली बार साइकिल कैसे मिली?
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कहानी बड़ी दिलचस्प है, बात 1960 दशक के उन दिनों की है. जब मुलायम सिंह पढ़ने के लिए गांव से 20 किलोमीटर इटावा के के.के डिग्री कॉलिज जाते थे. रोजाना बड़ी परेशानी के बाद वो कॉलिज पहुंच पाते थे. कभी पैदल जाते कभी किसी साथी के साथ. इस संघर्ष में एक अदद साइकिल की तमन्ना उनके दिल में थी. लेकिन घर की माली हालत के चलते ये संभव नहीं था.
फिर हुआ कुछ ऐसा कि…
एक दिन मुलायम सिंह यादव अपने मित्र रामरुप के साथ किसी काम से उझानी गांव गए थे. वहां कुछ लोग ताश खेल रहे थे. ताश खेल रहे उन लोगों में गिंजा गांव के आलू कारोबारी लाला रामप्रकाश गुप्ता भी ताश खेल रहे थे. मुलायम सिंह यादव और उनके मित्र रामरुप भी उनके साथ ताश खेलने लगे. साधारण खेल-खेल में लाला रामप्रकाश ने शर्त की बात कहकर अपनी साइकिल दांव पर लगा दी.
मुलायम सिंह पहले तो शर्त लगाकर खेलने के लिए मना करते रहे लेकिन लाला जब इठलाने लगे तो मुलायम सिंह ने शर्त मान ली. शर्त रखी गई कि, अगर मुलायम सिंह जीते तो साइकिल उनकी.लेकिन अगर हार गए तो जितने भी पैसे मुलायम सिंह के पास हैं वो सब देने पड़ेंगे. पत्ते खुले तो मुलायम सिंह का दांव भारी पड़ गया और वो साइकिल जीत गए. और खुशी-खुशी साइकिल लेकर घर चले आए. ऐसे मुलायम सिंह को साइकिल मिली. इसके बाद 4 नवंबर 1992 को जब उन्होंने अपनी सियासी पार्टी बनाई तो उन्होंने उसका चुनाव चिन्ह साइकिल रखा.उसी साइकिल पर सवार होकर मुलायम सिंह सियासत के बड़े सिकंदर बने.
