लखनऊ : सियासत को अगर तमाम संभावनाओं की सिद्धपीठ कहा जाए तो कहना गलत नहीं होगा. क्योंकि, महत्वकांक्षी-मनोकामनाओं का मुरीद बनकर, यहां कौन कब किस पाले में खड़ा होकर ‘सियासी श्रद्धालु’ हो जाए कहा नहीं जा सकता और ऐसा ही कौतूहल इस बात को लेकर है कि, आखिर शिवपाल-अखिलेश के नए अलगाव में मुलायम सिंह यादव किस पाले में खड़े हैं.
दरअसल, समाजवादी पार्टी से अलग ‘क्युलर मोर्चे’ का शिलान्यास कर चुके शिवपाल यादव का दावा है कि उन्होंने मुलायम सिंह के आशीर्वाद से उनकी अनुमति पर ही अलग मोर्चा बनाया है. सियासी गलियारों में तब और हलचल दिखी जब शिवपाल यादव ने अपने मोर्चे के झंडे में मुलायम सिंह यादव का फोटो चस्पा कर दिया और तो और शिवपाल यादव ने पार्टी की मीटिंग में मुलायम सिंह को मैनपुरी से चुनाव लड़ाने का प्रस्ताव रख दिया.

वहीं समाजवादी पार्टी का दावा ये कि नेताजी, अखिलेश यादव के साथ हैं. इन तमाम दावों के बीच लोग उस परिवारिक कलह को भी याद कर रहे हैं जब बीते साल पल-पल बदलते समीकरण में पता ही नहीं चल पा रहा था कि, मुलायम सिंह आखिर किसके साथ हैं और एक बार फिर इसी पटकथा की पुनरावृत्ति यादव परिवार के रंगमंच पर दिख रही है. इसी किस्सागोई में ये सवाल तब और जोर से शोर करने लगा जब मुलायम सिंह यादव जंतर-मंतर पर अखिलेश यादव के साथ दिखे. मुलायम सिंह की सपा के मंच पर मौजूदगी ने शिवपाल यादव के सेक्युलर मोर्चे में मायूसी पैदा कर दी.मुलायम सिंह के बारे में राजनीतिक पंडितों की दलील है कि ‘नेताजी’ कुश्ती में चरखा दांव के माहिर रहे हैं. इसी चरखा दांव से वो पलक झपकते ही विरोधी को चित कर देते थे और यही चरखा दांव वो अक्सर राजनीति के अखाड़े में आजमाते रहे हैं.
कई मौकों पर गच्चा दे चुके हैं मुलायम सिंह
1- ललितगेट और व्यापम पर विपक्ष के साथ लड़ते लड़ते मुलायम सिंह ने कांग्रेस के सदन के विरोध से खुद को अलग कर लिया था.
2- 2008 में वामदलों के अविश्वास प्रस्ताव से अचानक खुद को अलग करके वामदलों के विरोध की हवा निकाल दी थी.
3- 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में वो ममता बनर्जी को गच्चा देकर अलग हो गए थे.

बीते साल पार्टी और परिवार में हुई रार में भी मुलायम सिंह का किरदार खुद उनके अलावा कोई समझ ही नहीं पाया था. मुलायम सिंह एक सुबह में जहां अखिलेश यादव को जमकर कोसते थे वहीं शाम को शिवपाल को भला बुरा कहने से भी नहीं चूकते थे. एक समय ये भी आया था कि, मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव को ये तक कह दिया था कि, ‘जो बाप का नहीं हुआ वो किसी और का क्या होगा’ तब समझा जा रहा था कि मुलायम सिंह शिवपाल यादव के साथ हैं.लेकिन ये दावा भी तब हवा हवाई हो गया जब उस झगड़े में शिवपाल यादव के साथ मीडिया के सामने आकर मुलायम सिंह को नई पार्टी का ऐलान करना था. प्रेस कॉन्फ्रेंस से पहले मुलायम सिंह के हाथ में पर्ची भी थमाई गई थी, लेकिन मीडिया के सामने मुलायम सिंह उस पर्ची को पढ़ने के बजाए नई पार्टी बनाने की बात गोल कर दी.
उस दौरान मुलायम के बगल में बैठे शारदा शुक्ला बार-बार वो पर्ची पढ़ने के लिए मुलायम सिंह को दे रहे थे लेकिन मुलायम सिंह ने पर्ची नहीं पढ़ी. उसके बाद चुनाव आयोग और अदालतों तक चली नूराकुश्ती का नतीजा ये निकला था कि, अखिलेश यादव ‘टीपू’ से ‘सुल्तान’ बन गए. तब से लेकर अब तक नजरअंदाज किए जा रहे शिवपाल यादव को मजबूरन सेक्युलर मोर्चा बनाना पड़ा है. लेकिन यहां भी मुलायम सिंह पर सभी की नजरें जमी हुईं हैं. शिवपाल यादव मुलायम सिंह के आशीर्वाद से अपना मोर्चा बनाने का दावा कर रहे हैं. देखना दिलचस्प होगा कि अब मुलायम सिंह क्या भूमिका निभाते हैं. सैफई परिवार में नए दंगल और मुलायम सिंह को लेकर अपनी-अपनी दावेदारी पर फिर लोग पूछ रहे हैं कि, आखिर, इस दंगल में मुलायम सिंह खिलाड़ी हैं या अंपायर?
