बाबरी मस्जिद पर क्या सोचते थे पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ?

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बाबरी मस्जिद का जिक्र आते ही, 6 दिसंबर 1992 की यादें ताजा हो जाती है, हजारों कारसेवकों का उग्र जनसैलाव, मस्जिद के गुंबद पर चढ़कर उन्हें तोड़ते लोग, मस्जिद की बात हो तो इसमें सियासत भी शामिल हो जाती है…बाबरी मस्जिद के इतिहास, 1949 में वहां भगवान राम की स्थापना और 1990 से लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में हुई कारसेवा जिसके फलस्वरूप बाबरी मस्जिद का गिरना, इन सब पर कई बार चर्चा हो चुकी है, लेकिन जो एक पहलू आम तौर पर हम नहीं देखते वो ये है कि ऐसा क्या हुआ था, जिसने 1949 से ठंडे बस्ते में जा चुके इस ‘मुद्दे’ को राष्ट्रीय राजनीति का केंद्रबिंदु बना दिया था.

अयोध्या मसले पर नेहरु की राय

अगर देखा जाए तो 1949 में भी जब रातोंरात मूर्ति स्थापित हुई तो ये एक राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बना था. हां, इतना जरूर है कि तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त को इस बारे में आगाह किया था और बदले में पंत ने उनको आश्वासन भी दिया था, दरअसल, जिस रात विवादित परिसर में मूर्ति की स्थापना हुई थी, उससे अगली सुबह देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द बल्लभ पन्त से बातचीत की और कहा कि विवादित परिसर में मूर्ति की स्थापना भारत के लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकता है. इस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने नेहरु कऔ आश्वासन देते हुए कहा कि वो चिंता ना करें ऐसा कुछ नहीं होगा.

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पहली बार कब बनी अयोध्या राष्ट्रीय मुद्दा
बाबरी मस्जिद के राष्ट्रीय मुद्दा बन जाने की. हममें से अधिकतर भारतीय आज के समय में ये मानते हैं कि बाबरी मस्जिद का मुद्दा 1986 में तब राष्ट्रीय राजनीती में गूंजा, जब 1 फरवरी को राजीव गांधी की पहल पर अदालती आदेश के साथ पूजा अर्चना के लिए वहां का ताला खोल दिया गया. ये थोड़ा-थोड़ा ठीक है परन्तु पूरी कहानी इस से कहीं अधिक है.

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