ना तो मैं अयोध्या गया, ना मंदिर तुड़वाया, ना मस्जिद बनवाई- बाबर

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नई दिल्ली : अयोध्या विवाद देश का सबसे पुराना विवाद है, दशकों से चले आ रहे इस विवाद को फिलहाल अंत होता नहीं दिख रहा है, ऐसे में इस विवाद पर जितना फायदा सियासत उठाती है, इतना ही कवि और लेखक वर्ग इस विवाद को अपनी नजरों से देखते हैं, आइये आपको बताते हैं मशहूर उपन्यासकार कमलेश्वर की रचना ‘कितने पाकिस्तान’ का एक किस्सा जिसमें मुख्य किरदार अदीब ‘समय की अदालत’ लगा रहा है. इसमें बाबर के बयान दर्ज किए गए हैं. ये बयान कुछ यूं शुरू होता है-

बाबर जब अदालत में हाज़िर हुआ तो थका हुआ और नाराज था. क़ब्र से निकलकर आने में उसे बहुत तकलीफ़ हुई थी. अदालत ने कहा..

सारे झगड़े की जड़ तुम हो. न तुम राम मंदिर मिसमार (नष्ट) करते न ये झगड़े होते…..

मेरा अल्लाह और तारीख गवाह है… मैंने कोई मंदिर मिसमार नहीं किया और न हिंदुस्तान में कोई मस्जिद अपने नाम से कभी बनवाई. इस्लाम तो हिंदुस्तान में मेरे पहुंचने से पहले मौजूद था…क्या इब्राहिम लोदी खुद मुसलमान नहीं था जो आगरा की गद्दी पर बैठा हुआ था….

-सीधे-सीधे अपनी बाबरी मस्जिद का किस्सा बताओ!

-मैंने कहा न! आगरा मेरी राजधानी थी. अब सोचिए, उस वक़्त हिंदुओं के कृष्ण को भगवान और अवतार मंजूर किया जा चुका था. उनका जन्मस्थान मथुरा में था.. अगर मुझे तोड़ना ही था तो मैं कृष्ण का जन्मस्थान न तोड़ता? भागा-भागा अयोध्या तक जाके राम का जन्मस्थान क्यों तोड़ता?

-लेकिन दुनिया तो कहती है कि अयोध्या के राम मंदिर को तुमने 1528 में गिरवाया और अपने सूबेदार मीर बाक़ी को तुमने आदेश दिया कि उस जगह मस्जिद बनवा दी जाए…. तुम्हारी डायरी ‘बाबरनामा’ के साढ़े पांच महीनों यानी 3 अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 तक के दिनों के पन्ने क्यों गायब हैं?

-उसके बारे में मैं क्या कह सकता हूं!

 बाबर अयोध्या गया या नहीं?
-तुम्हें बताना पड़ेगा, क्योंकि 2 अप्रैल को तुम अवध में अयोध्या के ऊपरी जंगलों में शिकार खेल रहे थे. उसके बाद के पन्ने गायब हैं. फिर तुम ‘बाबरनामा’ के मुताबिक़ 18 सितंबर 1528 को आगरा में दरबार लगाए बैठे हो. इस बीच तुम कहां थे. क्योंकि अंग्रेज़ गजेटियर लेखक एचआर नेविल ने यह साफ़-साफ़ लिखा है कि 1528 की गर्मियों, यानी अप्रैल और अगस्त के बीच तुम अयोध्या पहुंचे. वहां तुम एक हफ़्ते रुके और तुमने प्राचीन राम मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया और वहां मस्जिद तामीर करवाई. जिसे बाबरी मस्जिद का नाम दिया गया!

-यह सरासर गलत है! बाबर बोला- मैं क़ब्र में लेटा-लेटा इन सदियों को गुज़रते देखता रहा हूं. सन 1849 तक या कहिए कि 1850 तक तो सब ठीकठाक चला लेकिन 1857 के बाद सल्तनते बरतानिया की नीति बदलनी शुरू हुई…

-बाबर ठीक कह रहे हैं. ए. फ़्यूहरर (आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के डायरेक्टर) ने बीच में टोका. हमारी पॉलिसीज़ बदलीं और तब यह तय किया गया कि हिंदू और मुसलमान जो 1857 में एक हुए थे, इन्हें अलग-अलग रखा जाए…नहीं तो अंग्रेज़ी हुक़ूमत चलने नहीं पाएगी. इसीलिए मैंने बाबरी मस्जिद पर लगा इब्राहीम लोदी का जो शिलालेख पढ़ा था, उसे जानबूझकर मिटाया गया..लेकिन मैंने उसका जो अनुवाद किया था वह आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की फ़ाइलों में पड़ा रह गया. उसे नष्ट करने का खयाल किसी को नहीं आया.

इसी के साथ ‘बाबरनामा’ के वो पन्ने ग़ायब किए गए जो इस बात का सबूत देते हैं कि बाबर अवध में गया तो ज़रूर पर कभी अयोध्या नहीं गया.. और उसके बाद हमारी अंग्रेज़ कौम ने और खासतौर से एचआर नेविल ने जो फ़ैज़ाबाद गजेटियर तैयार किया, उसने शैतानी से यह दर्ज किया कि बाबर अयोध्या में एक हफ़्ते ठहरा और इसी ने प्राचीन राम मंदिर को मिसमार (नष्ट) किया…

यह तो हुई ‘कितने पाकिस्तान’ की बात. अयोध्या का सच इतिहास के कई टुकड़ों में बिखरा हुआ है.

पानीपत में इब्राहीम लोदी की हार के बाद बाबर ने अपने सूबेदार मीर बाक़ी ताशकंदी को अवध का इंचार्ज बनाया और ख़ुद ग्वालियर जीतने निकल गया. ‘फ़ैज़ाबाद: सांस्कृतिक गजेटियर’ में प्रो. नीतू सिंह ने यह लिखा है. इसमें उन्होंने दावा किया है कि बाक़ी ने अयोध्या में 1528 में एक मस्जिद बनवाई.

इतिहासकार इरफ़ान हबीब ‘मेडिवल अयोध्या (अवध), डाउन टु द मुग़ल ऑक्युपेशन’ में कहते हैं कि बाबर उस साल अयोध्या में घुसा ही नहीं था- “पानीपत की जीत के बाद बाबर ने पूर्वी प्रांतों को क़ाबू करना शुरू किया. उसने फारमुली वंश के शेख बायज़िद को अवध का गवर्नर बनाया. बायज़िद ने जब बग़ावती तेवर दिखाए तो बाबर ने 28 मार्च 1528 को अवध (अयोध्या) से क़रीब 5-8 मील पहले अपना कैंप लगाया. बाबर के सिपाहियों ने बायज़िद को सरयू से पीछे खदेड़ दिया, जहां वह डेरा डाले था. ख़ुद बाबर ने अयोध्या में दाखिल होने का ज़िक्र नहीं किया है..”

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