समुद्र मंथन से जुड़ी है कुंभ में स्नान की परंपरा, ऐसे शुरू हुआ था मेला

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लखनऊ/प्रयागराज: भारत देश एक आध्यात्मिक देश है. जहां कई व्रत और त्यौहार मनाए जाते हैं. यहां धार्मिक-आध्यात्मिक आयोजन बहुत ही भव्य व आस्था के साथ मनाए जाते हैं. कुंभ मेला भई इन्ही आयोजनों में से एक है इसमें शामिल होने के लिए देश-विदेश से कई लोग आते हैं. इस बार भी यह मेला प्रयागराज में किया जा रहा है. प्रयागराज में अर्धकुंभ 15 जनवरी 2019 से प्रारंभ हो जाएगा और 04 मार्च 2019 तक चलेगा. देश के सबसे बड़े धार्मिक मेले कुंभ की परंपरा बहुत पुरानी परंपरा है.

कुंभ का अर्थ होता है घड़ा. साथ ही कलश को भी कुंभ कहा जाता है. इस पर्व का संबंध समुद्र मंथन के दौरान अंत में निकले अमृत कलश से जुड़ा है. बताया जाता है कि जब देवता और असुर अमृत कलश को एक दूसरे से छीन रह थे तब उसकी कुछ बूंदें धरती की तीन नदियों में गिरी थीं और जहां ये बूंदें गिरी थी उस स्थान पर तब से कुंभ मेले का आयोजन किया जाने लगा. उन तीन नदियों के नाम गंगा, गोदावरी और क्षिप्रा है.

अमृत पर अधिकार को लेकर देवता और असुरों के बीच लगातार बारह दिन तक युद्ध चलता रहा जोकि मनुष्यों के लिए बारह वर्ष के समान हैं. इसलिए कुंभ भी बारह होते हैं. उनमें से चार कुंभ पृथ्वी पर होते हैं और आठ कुंभ देवलोक में होते हैं.

समुद्र मंथन की कथा के मुताबिक कुंभ पर्व का सीधा सम्बन्ध तारों से होता है. अमृत कलश को स्वर्गलोक तक ले जाने में जयंत को 12 दिन लगे. बता दें कि देवों का एक दिन मनुष्यों के लिए 1 वर्ष के बराबर है. इसलिए तारों के क्रम के अनुसार हर 12वें वर्ष कुंभ पर्व विभिन्न तीर्थ स्थानों पर आयोजित किया जाता है.

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युद्ध के दौरान सूर्य, चंद्र और शनि आदि देवताओं ने कलश की रक्षा की थी. उस वक्त की वर्तमान राशियों पर रक्षा करने वाले चंद्र-सूर्यादिक ग्रह जब आते हैं तब कुंभ का योग होता है और चारों पवित्र स्थलों पर प्रत्येक तीन वर्ष के अंतराल पर क्रमानुसार कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है.

आपको बता दें कि अमृत की कुछ बूंदे छलकने के समय जिन राशियों में सूर्य, चंद्रमा, बृहस्पति की स्थिति के विशिष्ट योग के अवसर रहते हैं वहां कुंभ पर्व का इन राशियों में गृहों के संयोग पर आयोजन होता है. इस अमृत कलश की रक्षा में सूर्य, गुरु और चन्द्रमा के विशेष प्रयत्न रहे थे. यही वजह है कि इन्हीं गृहों की उन विशिष्ट स्थितियों में कुंभ पर्व मनाने की परम्परा है.

सबसे खास बात यह है कि अमृत की बूंदें जिन चार जगह गिरी थी वह गंगा नदी (प्रयाग, हरिद्वार), गोदावरी नदी (नासिक), क्षिप्रा नदी (उज्जैन) है. इन सभी नदियों का संबंध गंगा से है. गोदावरी को गोमती गंगा के नाम से पुकारते हैं. क्षिप्रा नदी को भी उत्तरी गंगा के नाम से जानते हैं यहां पर गंगा गंगेश्वर की आराधना की जाती है.

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