लखनऊ : 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव जीतने के लिए सपा-बसपा ने गठबंधन कर उत्तर-प्रदेश की राजनीति को नया रुप दे दिया है. बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती और समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने को लखनऊ के गोमती नगर स्थित ताज होटल में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर…इसका औपचारिक ऐलान किया. जिसके बाद तय हो गया के सूबे की दो बड़ी पार्टियां चुनावी मैदान में एक साथ बैटिंग करने उतरेंगी.गठबंधन में सीटों का जो फॉर्मूला तय हुआ है. उसके मुताबिक उत्तर-प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से एसपी और बीएसपी का गठबंधन 78 सीटों पर चुनाव लड़ेगा जिसमें 38 सीटों पर एसपी और बीएसपी लड़ेंगे. 2 सीटे गठबंधन के अन्य सहयोगियों के लिए तय हुई हैं. बाकी अमेठी और रायबरेली सीट कांग्रेस के लिए छोड़ी जाएगी.
क्यों छोड़ी अमेठी और रायबरेली
अब सवाल यहीं से खड़ा होता है कि जब सपा-बसपा सभी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे तो फिर 2 वीवीआईपी सीट क्यों छोड़ रहे है तो इसके जवाब में कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है के मोदी सरकार द्वारा दिए गए 10 फीसदी आरक्षण वाले तोहफे को तहसनहस करने के लिए भी गठबंधन ने रणनीति तैयार कर ली है. यादव-मुस्लिम और दलित वोट गठबंधन के पास पहले से ही है, लेकिन सवर्ण समाज का वोट पाले में लाने के लिए कांग्रेस को अलग किया गया है.
क्या है माया-अखिलेश-राहुल की रणनीति
इस रणनीति का आधार गठबंधन से किनारे कर दी गई कांग्रेस पार्टी है. राजनीतिक जानकारों का मानना है. कांग्रेस को गठबंधन से बाहर रखना. सपा, बसपा और कांग्रेस के शीर्ष वर्ग की प्लानिंग का एक हिस्सा है. क्योंकि अगर कांग्रेस पार्टी भी गठबंधन में शामिल होती है तो ब्राह्मण समाज का 10 फीसदी वोट बीजेपी के पड़ले में जाना तय है, लेकिन कांग्रेस गठबंधन से अलग होकर चुनावी युद्ध लड़ती है तो वो ब्राह्मण वोट में सेंधमारी कर बीजेपी को नुकसान पहुंचा सकती है.
