अखिलेश को विरासत में मिली है साइकिल, लेकिन मुलायम ने तो दिन रात एक किए थे…

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नई दिल्ली : लोकसभा चुनावों का आगाज होते ही मायावती और अखिलेश यादव ने गठबंधन कर सबको चौंका दिया है. जो बुआ और बबुआ कल तक चुनावी मैदान में एक दूसरे के खिलाफ आग उगलते थे आज एक साथ लड़ने को तैयार है. माय़ावती का चुनाव चिन्ह हाथी उन्हें खुद ही मेहनत और लगन से मिला है. लेकिन अखिलेश यादव के पास जो कुछ भी है वो उन्हें विरासत में पिता मुलायत सिंह यादव और चाचा शिवपाल यादव से विरासत में मिला हुआ है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिरकार मुलायम सिंह यादव को ये चुनाव चिन्ह कब और कैसे मिला. तो चलिए आज जानते हैं मुलायम सिंह की वो कहानी जब उन्हें साइकिल मिली. उस साइकिल पर सवार होकर उन्होंने राजनीति में इतना बड़ा सफर तय किया, जिसका हर राजनेता सपना देखता है.

दिलचस्प है मुलायम की कहानी
कहानी बड़ी दिलचस्प है, बात 1960 दशक के उन दिनों की है. जब मुलायम सिंह पढ़ने के लिए गांव से 20 किलोमीटर इटावा के के.के डिग्री कॉलिज जाते थे. रोजाना बड़ी परेशानी के बाद वो कॉलिज पहुंच पाते थे. कभी पैदल जाते कभी किसी साथी के साथ. इस संघर्ष में एक अदद साइकिल की तमन्ना उनके दिल में थी. लेकिन घर की माली हालत के चलते ये संभव नहीं था.

फिर हुआ कुछ ऐसा कि…
एक दिन मुलायम सिंह यादव अपने मित्र रामरुप के साथ किसी काम से उझानी गांव गए थे. वहां कुछ लोग ताश खेल रहे थे. ताश खेल रहे उन लोगों में गिंजा गांव के आलू कारोबारी लाला रामप्रकाश गुप्ता भी ताश खेल रहे थे. मुलायम सिंह यादव और उनके मित्र रामरुप भी उनके साथ ताश खेलने लगे. साधारण खेल-खेल में लाला रामप्रकाश ने शर्त की बात कहकर अपनी साइकिल दांव पर लगा दी.

मुलायम सिंह पहले तो शर्त लगाकर खेलने के लिए मना करते रहे लेकिन लाला जब इठलाने लगे तो मुलायम सिंह ने शर्त मान ली. शर्त रखी गई कि, अगर मुलायम सिंह जीते तो साइकिल उनकी.लेकिन अगर हार गए तो जितने भी पैसे मुलायम सिंह के पास हैं वो सब देने पड़ेंगे. पत्ते खुले तो मुलायम सिंह का दांव भारी पड़ गया और वो साइकिल जीत गए. और खुशी-खुशी साइकिल लेकर घर चले आए. ऐसे मुलायम सिंह को साइकिल मिली. इसके बाद 4 नवंबर 1992 को जब उन्होंने अपनी सियासी पार्टी बनाई तो उन्होंने उसका चुनाव चिन्ह साइकिल रखा.उसी साइकिल पर सवार होकर मुलायम सिंह सियासत के बड़े सिकंदर बने.

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