मैनपुरी: ना तो मुलायम सिंह के लिए मैनपुरी नया था और ना मैनपुरी के लिए मुलायम सिंह नए थे. मैनपुरी से चार बार सांसद रहे मुलायम सिंह ने पांचवी बार नामांकन किया. लेकिन मुलायम सिंह के नामांकन में इस बार बहुत कुछ नया था.
और मुस्कुरा उठे मुलायम सिंह
मुलायम सिंह और मायावती के सियासी रिश्ते की दुश्मनी जगजाहिर रही है. लेकिन 24-25 साल बाद दोनों दलों की दोस्ती के जो रंग मुलायम सिंह के नामांकन में दिखे वो मुलायम सिंह को भी बड़ा शुकून दे रहे थे. दरअसल, मुलायम सिंह जब नामांकन के लिए निकले तो उनके काफिले मे गठबंधन का चोखा रंग दिखा. मुलायम सिह जब मैनपुरी की सड़कों पर नामांकन के लिए निकले तो सपा के लाल और बसपा के नीले झंडों की जुगलबंदी देखते ही बन रही थी. कार्यकर्ताओं के जोश में मुलायम सिंह भी मुस्कुरा रहे थे. मुलायम सिंह बार-बार चारों तरफ घूम-भूम कर तसल्ली से उस नजारे को देख भी रहे थे. ऐसा लग रहा था कि, जैसे बेटे की राजनीति का ये रंग उनको भी अपने रंग में रंग रहा था. मुलायम सिंह के लिए बने रैली के मंच पर भी लाल नीले गुब्बारे नए रिश्ते पर इठलाते दिख रहे थे.

लेकिन उदास भी दिखे मुलायम सिंह
मुलायम सिंह के नामांकन में शिवपाल यादव हर बार प्रस्तावक के तौर पर मौजूद रहते थे. इस बार शिवपाल यादव का साथ ना होना मुलायम सिंह को खल भी रहा था. नामांकन के वक्त नेताजी के चेहरे को देखकरलग रहा था कि, जैसे उनकी आंखें शिवपाल यादव को भी खोज रही हों.
बसपा नेता बने नेताजी के प्रस्तावक
सपा संरक्षक मुलायम सिंह के नामांकन के प्रस्तावकों में इस बार बसपा नेता का नाम भी शामिल रहा है. इसके जरिए सपा-बसपा ने संदेश पहुंचाने की कोशिश की है कि, वो हर जगह एक दूसरे के साथ हैं. नामांकन के बाद हुई रैली में इस बात पर खासा जोर भी दिखा. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और महासचिव रामगोपाल यादव ने मंच से लोगों से अपील भी की. और बसपा के लोगों से साइकिल पर मुहर लगवाने की अपील भी की.
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क्या है मैनपुरी का समीकरण
16 लाख से ज्यादा वोटरों वाले इस संसदीय क्षेत्र में सपा वैसे को मुस्लिम और यादव समीकरण के सहारे साइकिल को चलाती रही है. लेकिन इस बार दलित वोटों की उम्मीद से साइकिल की रफ्तार और तेज हो सकती है. यहां मुस्लिम, यादव और दलितों की संख्या करीब 55-60 फीसदी है.
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