अलीगढ़ के इन बाजारों के आगे नोएडा का अट्टा और दिल्ली का कनॉट प्लेस कुछ नहीं

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अलीगढ़- दिल्ली एनसीआर के दो प्रमुख बाजार नोएडा का अट्टा और दिल्ली काकनॉट प्लेस है, ये बाजार दुनियाभर में अपनी खासियत के चलते मशहूर है।यहां आधुनिकता से जुड़ी वस्तुओं का वैभव चौंकाता है तो ऐतिहासिक स्वरूप लुभाता है। कुछ ऐसे ही खास बाजार हर शहर में होते हैं। वे इतने विशाल तो नहीं, पर उनकी पहचान जिले में अलग होती है। अलीगढ़ में भी ऐसे बाजार हैं, जो दैनिक उपयोग की हर चीज की उपलब्धता के लिहाज से कनॉट प्लेस और अट्टा से कम नहीं हैं, आज आपको हम इन्हीं बाजारों के बारे में बताएंगे, तीज-त्योहार या फिर किसी समारोह की तैयारी इन बाजारों के बिना पूरी नहीं हो पाती। इन्हीं में शामिल सेंटर प्वॉइंट किसी बड़े शहर के बाजार का आभास कराता है तो प्रतिष्ठानों से लबालब रेलवे रोड और मामूभांजा लोगों को अपनी ओर खींचते हैं। इन बाजारों में रोजाना करोड़ों का कारोबार होता है। जाम व तंग गलियों की परवाह किए बिना लोग खरीदारी का लुत्फ उठाते हैं.

अलीगढ़ की जान सेंटर प्वॉइंट

सेंटर प्वॉइंट जाएंगे तो आपको बड़े शहरों के किसी बाजार में आने जैसा अहसास होगा। शहर के बीचोंबीच तो है, पर अन्य बाजारों से एकदम अलग दिखता है। यहां कई नामचीन कंपनियों के शोरूम हैं। खरीदारी ही नहीं, फास्टफूड की भी अच्छी दुकानें हैं। इन पर शाम के समय खूब रौनक रहती है। ऐसा 30 साल पहले नहीं था। बाजार में आए बदलाव की चर्चा पर 65 वर्षीय जावेद सईद तो पुरानी यादों में खो गए। तब उनकी छोटी-सी दुकान थी। बाजार देर से खुलता और जल्दी बंद होता था। खास चहल-पहल थी नहीं, लेकिन समय के साथ सब-कुछ बदल गया। अब दुकानें देर तक खुलती हैं और चहल-पहल भी खूब रहती है.

ऐतिहासिक चमक भी दिखती है

इस बाजार की स्थापना 80 के दशक में हुई। तब इसकी पहचान समद रोड के रूप में थी। सड़क काफी चौड़ी थी और करीब दर्जनभर दुकानें थीं। बाजार बढ़ा तो पहचान भी बदली। शहर के प्रसिद्ध टीकाराम मंदिर चौराहा नाम से इसे जाना जाने लगा। 1994-95 में इसके सुंदरीकरण पर ध्यान दिया गया। इसके लिए दुकानदारों ने बैठक की और नया नाम देने पर विचार किया। इस बैठक में शामिल 55 वर्षीय दुकानदार विपिन गर्ग बताते हैं कि शहर के सेंटर में होने के चलते बाजार का नाम सेंटर प्वॉइंट रखा गया।

अलीगढ़ का बिजली बाजार

मोबाइल फोन का कोई पार्ट हो या  इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम, यदि वह शहर के अन्य बाजार में न मिले तो मामूभांजा निराश नहीं करता। यहां हर इलेक्ट्रॉनिक आइटम आसानी से मिल जाता है। 40 साल पुराने दुकानदार सरदार बलजीत सिंह व 25 साल से दुकान चला रहे मोनू अग्रवाल तो इस बाजार को ‘चीप एंड बेस्टÓ मानते हैं। जब उन्होंने दुकान संभाली, तब बाजार में सिर्फ पायरेटेड सीडी का काम होता था, जिसकी काफी मांग भी थी। समय के साथ बदलाव आता गया। यहां की कुछ दुकानों पर आज भी आपको ग्रामोफोन देखने को मिल जाएंगे। तंग सड़क ों पर भीड़ के चलते जाम के हालात जरूर बनते हैं, पर इससे बाजार का आकर्षण प्रभावित नहीं हुआ.

ऐसे पड़ा बाजार का नाम

‘मामू-भांजाÓ बाजार का नाम एक मजार से पड़ा। इसकी चर्चा के दौरान मजार की देखरेख करने वाले शाहिद भावुक हो गए। बोले, पुरखों से किस्से सुने थे। बात 1700 के आसपास की है। मुगलों का शासन था। अंग्र्रेज कब्जा करना चाहते थे। इसको लेकर लड़ाई चल रही थी। उस दौरान मुगल सेना के सिपाही बारे खां बाबा अपने परिचित एक योद्धा व उसके दो भांजों को लाए और युद्ध लड़ा, जिसमें दोनों की मौत हो गई। उनकी मजार बाजार के चौराहे के पास आज भी है, जिसके आसपास 50 साल पहले तीन-चार दुकानें खोली गई थीं।  इनमें से एक दुकान के संचालक 65 वर्षीय ओमप्रकाश वाष्र्णेय की आस्था मजार के प्रति अपार है। वे पहले मजार जाते हैं फिर दुकान खोलते हैैं। 40 साल पुराने दुकानदार सरदार बलजीत सिंह के सामने ही मजार के नाम पर बाजार का नाम सभी दुकानदारों ने रखा। तब से अब तक नाम से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई.

 

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