लखनऊ: जैसे क्रिकेट तमाम संभावनाओं का खेल है. वैसे ही सियासत में भी कौन कब कैसे बाजी पलट दे पता नहीं चलता. राजनीति का तो रीवाज ही है कि यहां कोई किसी का ना तोस्थाई दोस्त होता है और ना दुश्मन. सियासी आस्था और महत्वकांक्षा में कब कौन किस पार्टी किसका दामन छोड़कर किसका हाथ थाम ले कहा ही नहीं जा सकता. चुनाव से पहले अंतरात्मा जाने का जनजागरण भी खूब होता है. लेकिन देश के इस सबसे बड़े रण में उत्तर प्रदेश के चुछ चेहरों को भूतकाल और वर्तमान की कसौटी पर कसकर देखें तो बड़ा बदलाव दिखता है. कल तक जो नेता उस पार्टी के जान देने की बात करते थे आज दूसरी पार्टी के पाले में खड़े होकर पहले को हराने में जी जान लगा रहे हैं. 2014 से 2019तक एक नजर उन खास चेहरों पर जो पहले जिताते थे अब हराने में लगे हैं.
नसीमुद्दीन सिद्दीकी: बहन जी के खास थे, अब कांग्रेस के साथ हैं
2014 के लोकसभा और 2017 के विधानसभा चुनाव तक नसीमुद्दीन सिद्दीकी नीला झंडा और हाथी निशान के बड़े नाम थे. सतीश चंद्र मिश्रा के साथ नसीमुद्दीन ही मायावती के सबसे खास सिपहसलारों में गिने जाते रहे. लेकिन अब 2019 के चुनावी बिसात पर वो बहन जी के हाथी की सवारी के बजाए कांग्रेस का हाथ मजबूत कर रहे हैं. बुंदेलखंड में खासा प्रभाव रखने वाले नसीमुद्दीन कांग्रेस के लिए कारगर साबित हो सकते हैं.
बृजेश पाठक: कल तक हाथी पर आज कमल के साथ
2014 के लोकसभा चुनाव में पाठक जी उन्नाव से बसपा के उम्मीदवार थे. उन्नाव और हरदोई सीट पर उनका अच्छा खासा प्रभाव भी है. 2004 में वो बीएसपी के टिकट पर उन्नाव से लोकसभा भी गए. लकिन 2019 के चुनाव में वो बीजेपी के साथ मिलकर बीएसपी और गठबंधन की घेराबंदी करेंगे.
स्वामी प्रसाद मौर्य: मायावती के भरोसेमद, अब बीजेपी के साथ
मायावती के सबसे करीबियों की लिस्ट देखें तो स्वामी प्रसाद मौर्य उनमें से एक नाम हैं. बसपा सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे मौर्य सदन में विरोधी दल के नेता भी रहे हैं. 2009 में कुशीनगर से लोकसभा का चुनाव लड़े थे. उस चुनाव में वो हार गए थे लेकिन बीजेपी के कैंडिडेंट को तीसरे नंबर पर पहुंचाने में उनका बड़ा योगदान रहा था और 2019 के चुनाव में अब बीजेपी के लिए ही वोट मांगते दिखाई देंगे.
सावित्री बाई फुले: 2014 में कमल, 2019 में कांग्रेस
2014 में बहराइच से बीजेपी की कमल खिलाने वाली सावित्री बाई फुले 2019 आते आते कमल छोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम चुकी हैं. सूबे में बड़ा दलिच चेहरा सावित्री 2019 में बीजेपी के लिए बहराइच से बड़ी चुनौती हो सकती है. क्योंकि, सावित्री बाई फुले हर मंच से बीजेपी को दलित विरोधी बताती नहीं थकती है.
रीता बहुगुणा जोशी: हाथ छोड़ा कमल पकड़ा,राजनाथ और अटल जी के खिलाफ लड़ी थीं
प्रदेश कांग्रेस के बड़े चेहरों में एक समय रीता बहुगुणा जोशी का नाम सबसे उपर हुआ करता था. लेकिन 2017 के चुनाव से कुछ दिन पहले रीता बहुगुणा जोशी ने कांग्रेस छोड़ बीजेपी का कमल थाम लिया था. बता दें कि, 2014 में रीता बहुगुणा राजनाथ सिंह के सामने लखनऊ से मैदान में थीं. और 2019 में वो भी बीजेपी का बूथ मजबूत करती दिख रही हैं.
अशोक वाजपेयी: समाजवादी से भगवा तक
लोहिया के समाजवाद के वाहकों में अशोक वाजपेयी का नाम भी आता है. असोक वाजपेयी पुराने समाजवादी हैं. 2014 के लोकसभा चुनाव में सपा ने उन्हें लखनऊ से उम्मीदवार बनाया था. लेकिन अचानक टिकट काट दिया गया. हालाकि, सपा ने उन्हें MLC बना दिया था लेकिन अशोक वाजेपयी बाद में इस्तीफा देकर बीजेपी में शामिल हो गए. बीजेपी ने उनके MLC पद की कुर्बानी पर राज्यसभा भेजकर इनाम दिया था. 2019 के चुनाव में वाजपेयी बीजेपी के लिए जमकर वोट मांग रहे हैं.
नरेश अग्रवाल: हर पार्टी के ‘नरेश’
नरेश अग्रवाल को उत्तर प्रदेश का राजनीतिक मौसम वैज्ञानिक कहा जाता है. यानि वो प्रदेश की ज्यादातर सरकारों के साथ रहे हैं चाहें सरकार किसी पार्टी की हो. 2014 में सपा का साइकिल पर सवार नरेश अग्रवाल इस बार बीजेपी के साथ हैं. इससे नरेश अग्रवाल का सियासी सफर देखें तो कांग्रेस, लोकतांत्रिक कांग्रेस, सपा, बसपा फिर सपा और अब बीजेपी में हैं.
