नई दिल्ली: देश में कुछ मुद्दों के मर्म में भले ही कई बार किसान राजनीति का मुद्दा ना रहे हों. लेकिन किसान और सियासत आजादी के बाद से ही एक सिक्के के दो पहलू रहे हैं. देश के पहले प्रधानमंत्री रहे पंडित नेहरू की राजनीति की सफल शुरुआतभी प्रतापगढ़ जिले से शुरु किए गए किसान मार्च से मानी जाती है. लाल बहादुर शास्त्री ने भी जय जवान-जय किसान का उद्घघोष किया था. 1927 में तो महात्मा गांधी ने कहा था कि, ‘मैं किसान बनना पसंद करुंगा, और कृषि में देश को वो मुकाम दिलाना चाहूंगा, जिसमें शहर के लोग गांव का रास्ता चुने’. लेकिन आज के हालात में गांव के लोग खेती-किसानी छोड़ शहर की तरफ जा रहे हैं. आंकड़े बताते है कि, करीब 62% किसान शहरी नौकरी के लिए किसानी छोड़कर शहर में कोई काम करना चाहते हैं. लेकिन मौजूदा हालात ये भी है कि, देश की राजनीति अब गांव-खेत और किसान की ओर आती दिख रही हैं.
2019 से पहले इसलिए याद आए किसान
कांग्रेस जहां पूरी तरह पूरे देश में किसानों के कर्जमाफी को मुद्दा बना चुकी है वहीं बाकी विपक्षी दल भी उसी सुर में सुर सजा रहे हैं. पीएम मोदी खुद किसान कर्ज माफी, फसल बीमा योजना, सरकारी मूल्य पर फसल खरीद, यूरिया नीम कोटिंग और किसानों से जुड़ी तमाम योजनाओं की कमान थामे हैं. केंद्र की मोदी सरकार पूरे देश के किसानों की कर्जमाफी का खाका खींच रही है. तो फिर सवाल उठता है कि, क्या 2019 की चुनावी चौसर पर गांव-खेती और किसान का अहम किरदार होगा. ये सवाल इसलिए है क्योंकि, प्रदेशों के साथ-साथ अब देश में राजनीति की दिशा का रुख भी इसी ओर दिख रहा है…।
राज्यों के बाद देश में कांग्रेस का किसान कार्ड
सत्ता की वंजर जमीन पर किसान कर्जमाफी की सिंचाई करके, कांग्रेस ने 3 सूबों में सत्ता की फसल उगा ली. राजस्थान, एमपी और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने किसान कार्ड बखूबू कैश करा लिया. अब पूरे देश में किसान कर्ज माफी के मुद्दे को बड़ा बनाकर, कांग्रेस 2019 के लिए नई पटकथा गढ़ने में जुटी है…मीडिया से रूबरू होते हुए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ये जता भी चुके हैं कि, वो अब चुप बैठने वाले नहीं हैं बकौल राहुल गांधी-

‘इस लड़ाई में एक तरफ गरीब,किसान मजदूर और छोटे व्यापारी हैं तो दूसरी तरफ 10-15 पीएम के चहते उद्योगपति. लेकिन कांग्रेस पार्टी और विपक्ष पीएम मोदी को तब तक सोने नहीं देंगे जब तक वो किसानों का कर्ज माफ नहीं करते, अगर वो नहीं करेंगे तो 2019 में हम करेंगे’
हो चुकी है ‘हल’चल की शुरुआत
बीते करीब 8 चुनावों में खेती-किसान के मुद्दों का शोर दिखा है. लेकिन पांच राज्यों के हालिया परिणाम ने तो हालात ही बदल दिए हैं. हर कोई किसानो के लिए कोलाहल कर रहा है.हर दल किसानों के लिए दिल चीरकर दिखा रहा है.
कांग्रेस शासित सूबों में कहां हुई कर्ज माफी
कांग्रेस शासित एमपी, राजस्थान और छत्तीगढ़ में किसानों के कर्ज माफी का ऐलान हुआ है. एमपी में 35 हजार करोड़, राजस्थान में 18हजार करोड़, छत्तीसगढ़ में 6100 करोड़ का कर्ज माफ किया गया है. पंजाब में 10,000 करोड़ और कर्नाटक में करीब 34 हजार करोड़ रुपये का कर्जमाफ किया गया.
बीजेपी शासित सूबो में किसान कर्जमाफी का कैलेंडर
यूपी में किसानों को 36 हजार 326 करोड़ कर्ज माफी की सौगात मिली थी.
महाराष्ट्र सरकार ने 34 हजार करोड़ रुपये की कर्ज माफी की घोषणा की है.
गुजरात में किसानों का 650 करोड़ बिजली बिल माफ किया गया है.
असम में भी 8 लाख किसानों को कर्ज माफी का तोहफा मिला है.
आंकड़े कहते हैं इसलिए हम हैं किसान
आंकड़े बताते है कि, अप्रेल 2017 से लेकर अब तक करीब 1 लाख 72 हजार 146 करोड़ का कर्ज माफ किया गया है. और 2019 के लिए वादों का पिटारा अभी खुलना बाकी है. अब अगर इसके पीछे की वजह देखें तो पता चलता है कि, देश में सबसे ज्यादा पहुंच वाला कोई काम अगर है, तो वो खेती-किसानी है. करीब 6 लाख 49 हज़ार 4 सौ 81 गांव, वाले देश में कहा भी यही जाता है कि, भारत गांव में बसता है. इसलिए अब 2019 के सियासी केंद्र में किसान धुरी बनता दिख रहा है. और इस बार किसान के पास सरकार बनाने की चाबी भी दिख रही है. देखना दिलचस्प होगा कि, 2019 में राजनीति का ऊंट किस खेत (करवट) बैठेगा ?

क्या है किसानों की हालत
देश में किसानों का एक बड़ा वोट बैंक है
करीब 62% किसान शहरी नौकरी के लिए किसानी छोड़कर शहर में कोई काम करना चाहते हैं.
बटाईदार या ठेके पर किसानी करने वाले आर्थिक तंगी में आत्महत्या को विवश हो जाते हैं
1970 और 2015 के बीच गेहूं का खरीद मूल्य सिर्फ 19 गुना बढ़ा है
इस दौरान सरकारी कर्मचारी की आमदनी 120 से 150 गुना बढ़ी है
कॉलेज टीचर्स की 150 से 170 और स्कूल टीचर की 280 से 320 गुना बढ़ गई है
मौजूदा समय में सरकारी कर्मचारियों को कुल 108 भत्ते मिलते हैं
देश के अन्नदाता को कई सहूलियत नहीं
2016 के आर्थिक सर्वेक्षण में 17 राज्यों में किसानों की सालाना औसत आय 2० हजार से भी कम
किसानों की मांग क्या है-
किसानों के लिए एक विशेष सत्र बुलाया जाए
किसान कर्ज की पूरी तरह माफी हो
फसलों की लागत का डेढ़ गुना दाम मिले
किसानों को पेंशन देने की मांग
स्वामीनाथन की रिपोर्ट लागू की जाए
ये आंकड़े रुला देंगे-
हर साल बढ़ा किसानों की मौत का आंकड़ा
30 दिसंबर 2016 NCRB के आंकड़े…
2015 में 12,602 किसानों- खेती मजदूरों की मौत!
2014 में 12,360 ने आत्महत्या की !
इन आंकड़ों में 42 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई !
13 सालों में औसतन हर दिन 2000 ने खेती छोड़ी !
1995 से अबतक 3लाख 18हजार किसानों की मौत!
