ओवैसी नहीं चाहते श्रीश्री रविशंकर करें राम मंदिर मामले की मध्यस्थता, कही ये बात

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उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर जन्मभूमि का मसला भारत के लिए एक ऐसा विवाद बन गया है जिसका अंत होने का नाम नहीं ले रहा है. वैसे इसके हल न होने से राजनेताओं को काफी फायदा पहुंचता है क्योंकि जैसे ही चुनाव पास आते है वो राम मंदिर को लेकर एक दूसरे पर उंगली उठाना शुरू कर देते है. ये मामला न जाने कितने सालों से कोर्ट में चल रहा है. इसकी हर सुनवाई पर लोग अपनी उम्मीदें बांध लेते है कि इस बार तो इसका फैसला हो जाएगा लेकिन बाद में सिर्फ निराशा ही हाथ आती है.

हर बार तारीख पर तारीख बढ़ती जाती है और इस बार सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद मामले को 8 मार्च को मध्यस्थता के लिए भेज दिया. सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या विवाद का हल निकालने के लिए तीन सदस्यीय पैनल का गठन किया है. जिसमें आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर की निष्पक्षता पर हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल खड़े कर दिए है.

आपको बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा बनाया गया ये पैनल हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों से बातचीत के जरिए विवाद का हल निकालने की कोशिश करेगा. पैनल में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एफएफ कलीफुल्लाह, आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और रिटायर्ड जज श्रीराम पंचू शामिल हैं. पैनल को मध्यस्थता की प्रक्रिया पूरी करने के लिए आठ सप्ताह यानि दो महीने का समय मिला है.

दरअसल, पैनल बनने के बाद इसमें आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर की निष्कक्षता को लेकर हैदराबाद के सांसद ओवैसी ने अपनी राय दीं है. ओवैसी ने अपनी राय देते हुए कहा कि अदालत को उनकी जगह किसी तटस्थ शख्स को समिति में शामिल करना चाहिए था. इसी के साथ उन्होंने अपने बयान में ये भी कहा कि श्री श्री रविशंकर ने एक बार अपने बयान में ये भी कहा था कि अगर मुसलमानों ने अयोध्या में अपना दावा नहीं छोड़ा तो भारत सीरिया बन जाएगा. इसलिए ये अच्छा होता अगर सुप्रीम कोर्ट किसी निष्पक्ष व्यक्ति की नियुक्ति करता.

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुनवाई के दौरान इस विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता का मार्ग निकाला है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पिछले 70 सालों से ये मामला अदालत में चल रहा है इस मसले को मध्यस्थता के जरिए ही सुलझाना ठीक रहेगा. ये जमीन का नहीं बल्कि दोनों धर्मों के लोगों की धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मामला है.

ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है जब राम मंदिर जमीन विवाद को बातचीत से सुलझाने का फैसला किया गया हो इससे पहले भी 4 बार इस तरह की कोशिश की जा चुकी है जो पूरी तरह से असफल साबित हुई थी.

अब सभी की नजरें एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त तीन सदस्यीय पैनल पर टिकी हैं. ये पैनल दोनों पक्षों से बातचीत के जरिए एक समधाना की तरफ बढ़ने की कोशिश करेगा. अगर इस प्रयास में ये पैनल फेल हो जाती है तो सुप्रीम कोर्ट को अपना फैसला सुनाना पड़ेगा. मध्यस्थता के जरिए अयोध्या केस का समाधान निकालने के सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का ज्यादातर लोगों ने स्वागत किया है. लेकिन कुछ लोगों ने आशंकाएं भी जताई हैं.

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