अलीगढ़: शहर की ऐतिहासिक जामा मस्जिद में दरारें आ गई हैं. मस्जिद की दीवारों में पड़ी दरारों के चलते स्थानीय लोगों में बैचेनी बढ़ गई है. दरअसल, ऊपरकोट इलाके में स्थित इस जामा मस्जिद की एक अलग पहचान है. यह मस्जिद 290 साल पुरानी है. इसकी देखभाल करने की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग की है. जामा मस्जिद के पास पड़ी भूमिगत पाइप लाइन भी दिक्कत पैदा कर रही है इससे दरारें पड़ रही हैं.
मुगलकाल में बनी मस्जिद
मुगलकाल में मोहम्मद शाह के शासन काल में कोल के गवर्नर साबित खान ने वर्ष 1724 में मस्जिद की तामीर शुरू कराई थी. मस्जिद को मुकम्मल होने में चार साल लगे. वर्ष 1728 में मस्जिद तैयार हुई, मस्जिद में 17 गुंबद हैं, जिनमें करीब पांच हजार लोग नमाज पढ़ सकते हैं. मस्जिद में तीन बुलंद दरवाजे हैं. इन दरवाजों पर दो-दो गुंबद है.
गुंबद में लगा है सोना
अलीगढ़ की जामा मस्जिद में सोना लगा हुआ है. हालांकि, इन गुंबद में कितना सोना लगा है, इसकी सटीक जानकारी किसी के पास नहीं है। सोना लगा होने की पुष्टि जामा मस्जिद इंतजामिया कमेटी भी कर चुकी है.
मस्जिद है शिल्पकला का अद्भुत नमूना
मस्जिद के सफेद गुंबद और नक्काशी वाले खंभे बरबस अपनी ओर खींचते हैं. ये शिल्पकला का अद्भुत नमूना है. देश की संभवत: यह पहली मस्जिद होगी जहां शहीदों की कब्रें भी हैं.
मस्जिद परिसर में हैं 73 शहीदों की कब्रें
जामा मस्जिद में 1857 गदर के 73 शहीदों की कब्रें भी हैं. मस्जिद परिसर में शहीदों की कब्र के चलते इसे गंज-ए-शहीदान भी कहते हैं. 290 साल पुरानी मस्जिद में एक अनुमान के मुताबिक आठवीं पीढ़ी नमाज पढ़ रही है.
