हिन्दू धर्म में कई त्योहार मनाए जानते हैं, जिनका अपना ही अलग-अलग महत्व होता है, जिनमें से एक है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी जो इस साल 24 अगस्त को पूरे भारत में मनाई जाएगी. इस दिन की खासियत है कि ये भारत के साथ-साथ कई अन्य देशों में भी धूमधाम से मनाया जाता है. वहीं आज हम आपको श्रीकृष्ण के जीवन में 8 अंक के खास महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं, तो आइए आपको श्रीकृष्ण से जुड़ी कुछ ऐसी दिलचस्प बातों के बारे में बताते हैं, जिनसे आप इससे पहले शायद अंजान रहे होंगे…
जानिए श्रीकृष्ण के जीवन में 8 अंक का महत्व
श्रीकृष्ण के जीवन में वो सभी रंग पाए जाते हैं, जो एक इंसान के जीवन में होते हैं, ये एक शिष्य थे, तो गुरु भी थे, आदर्श मित्र थे, तो कंस के शत्रु भी थे. आदर्श पुत्र थे, तो आदर्श पीता भी थे. एक उत्तम पति थे, तो लाजवाब प्रेमी भी थे. ये ही वजह है कि उन्हें पूर्णावतार कहा गया था, तो आइए आपको श्रीकृष्ण से जुड़े 8 अंकों के महत्व के बारे में बताते हैं.
श्रीकृष्ण आठवें मनु के काल में अष्टमी के दिन जन्में, ये वासुदेव के 8वें पुत्र के तौर पर जन्में थे और इनकी 8 सखियां, 8 पत्नियां, 8 मित्र और 8 शत्रु भी थे.
इतना ही नहीं श्रीकृष्ण के 8 मुख्य नाम भी है, जो हैं- कन्हैया, श्याम, नंदलाल, गोपाल, बांके बिहारी, केशव, रणछोड़दास, द्वारिकाधीश और वासुदेव.
वहीं श्रीकृष्ण की पूजा में 8 चीजों का खास प्रयोग किया जाता है, वो है- मोर मुकुट, बंसी, सुदर्शन चक्र, पितांभर वस्त्र, पांचजन्य शंख, माखन मिश्री, गाय और कमल का फूल.
आपको बता दें कि कृष्णजी की आठ सखियां थी. जिनके नाम है- राधा, चन्द्रावली, ललिता, विशाखा, भद्रा, श्यामा, शैव्या और पद्या. इनके अलावा आठ मित्र भी थे, सुदामा, सुबल, श्रीदामा, अर्जुन, वृषबन्धु, मन:सौख्य, स्तोक कृष्ण, सुभग, प्राणभानु और बली.
श्रीकृष्ण की पत्नियां भी 8 ही जानी जाती है, जिनके नाम है- रुक्मिणी, जाम्बवंती, लक्ष्मणा, भद्रा, सत्यभामा, मित्रवंदा, कालिंदी और सत्या थीं, जिनसे उन्हें कई पुत्र और पुत्रियां भी थी.
श्रीकृष्ण के लीला स्थान और जहां-जहां वे रहे हैं उन जगहों के नाम मथुरा, गोकुल, नंदगाव, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, मधुवन और द्वारिका हैं. ये सभी अब तीर्थस्थल के नाम से भी जाने जाते हैं.
कृष्ण जी ने जिनका वध किया था और कुछ समय पहले जिन्होंने कृष्णा को अपना गुरु माना था, उनके नाम पूतना,कालिया, ताड़का, नरकासुर, बकासुर, व्योमासुर, शटकासुर और कंस हैं.
वहीं कृष्ण जी के अंधभक्त भी 8 ही थे, जिनमें सूरदास, मीराबाई, ध्रुवदास, चैतन्य महाप्रभु, रसखान, व्यासजी, स्वामी हरिदास और श्रीभट्ट थे, इन सभी ने कृष्ण जी पर कई रस में गुणगान किया है.
