हर नया साल जहां नई उम्मीदें, नई आशाएं और नए सपनों की नींव रखता है…तो वहीं बीते हुए साल में कुछ ऐसे निशां, कुछ ऐसी यादें और कुछ ऐसे किस्से होते हैं जो देशकाल और परिस्थितियों के पटल पर अलग पहचान रखते हैं…जिनसे समाज और सियासत किसी ना किसी तरह प्रभावित रहे रहते हैं ये हैं 2019 की वो 19 घटनाएं जो सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहीं. जिन्होंने समाज और सियासत को प्रभावित भी किया.
1- CAA पर संग्राम, हंगामा तमाम
नागरिकता संशोधन एक्ट, साल 2019 के सर्द मौसम का ये वो मुद्दा है. जो सबसे ज्यादा गर्म रहा. दरअसल, 9 दिसंबर 2019 को राज्यसभा से नागरिकता संशोधन बिल पास हुआ. इस बिल के मुताबिक पड़ोसी देश पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आने वाले ग़ैरमुस्लिम शरणार्थियों को भारत की नागरिकता का प्रावधान है. लेकिन नागरिकता के इस क़ानून में इन सभी देशों के मुसलमानों को जगह नही दी गई. राज्यसभा से ये बिल पास हो गया. साल 2019 के आख़िरी महीने, यानि दिसंबर में CAA पर ऐसा दंगल मचा कि, देखते ही देखते पूरा देश इसकी ज़द में आ गया. विरोध का बिगुल बजा और शहर-शहर प्रदर्शन का शोर सुनाई देने लगा फिर तो, क्या दिल्ली और क्या देश के दूसरे शहर हर तरफ आक्रोश की आग दिखी. उत्तर प्रदेश के भी तमाम शहर भी इस आग में सुलग उठे. CAA को NRC का पहलू बताकर पॉलिटिक्स भी खूब परवान चढ़ी, हालांकि, हंगामा अब NPR पर भी होता दिख रहा है।
2- असम में NRC
NRC- नेशनल रजिस्टर ऑर सिटीजंस, साल 2019 का ये वो सुलगता मुद्दा है, जिसने असम सहित देश की सियासत में भूचाल ला दिया. दरअसल, घुसपैठियों की पहचान के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर असम में NRC लागू की गई. इसके मुताबिक, असम का नागरिक साबित करने के लिए लोगों को 24 मार्च 1971 से पहले जारी किए गए दस्तावेज, बतौर सबूत पेश करने थे. इसके लिए 1951 के एनआरसी या 24 मार्च 197 तक जारी की गई वोटर लिस्ट भी मान्य थी. लेकिन एनआरसी की अंतिम लिस्ट में लाखों लोगों के नाम नहीं होने पर सियासी गलियारों में गदर मच गया. उत्तर से लेकर पूर्वोंत्तर तक NRC पर पाला खींच गया. कुछ पक्ष में हैं तो कुछ विरोध में NRC केवल असम तक रहेगी या पूरे देश में लागू होगी, सियासत की भट्टी पर ये अभी मुद्दा पक ही रहा है लेकिन साल 2019 में यही मुद्दा सबसे ज्यादा सुर्खियों में रहा.
3- राम मंदिर पर फैसला
साल 2019 जिस बात के लिए सबसे ज्यादा जाना जाएगा, वो है क़रीब 500 साल पुराने अयोध्या विवाद का निपटारा. करीब 135 साल से अदालतों में चली आ रही अयोध्या की लड़ाई को, देश की सबसे बड़ी अदालत ने 40 दिन लगातार सुनवाई के बाद अंज़ाम तक पहुंचा दिया. सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए अयोध्या विवाद का अध्याय सदा के लिए बंद कर दिया. इस मामले में दायर की गई याचिकाएं भी खारिज हो गए हैं.
4- अनुच्छेद 370 की विदाई
अनुच्छेद 370 को अब तक अनछुआ ही समझा जाता था. लेकिन साल 2019 के सावन में, तीसरे सोमवार को ख़ुशियों की ऐसी बरसात हुई कि, जम्मू-कश्मीर और शेष भारत के लोग एक जैसे नागरिक हो गए. 370 की विदाई के साथ ही जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश हो गया वहीं अलग राज्य बनने की लद्दाख़ वालों के मन की मुराद भी पूरी हो गई. यानि साल 2019 कश्मीर की जम्हूरियत के लिए बराबरी की सौगात वाला रहा. देश की सियासत में ये घटनाक्रम एक ऐतिहासिक अध्याय बन गया है.
5- तीन तलाक़ हुआ हलाक़
साल 2019 ही नहीं, 2019 का तो सावन भी सुर्खियों में रहा और सावन में भी सोमवार ने खूब सुर्ख़ियां बटोरीं दरअसल, सावन के पहले सोमवार को चंद्रयान-2 छोड़ा गया था, तीसरे सोमवार को 370 की विदाई हुई थी, और सावन का दूसरा सोमवार तो दशकों की दासता से मुक़्ति का दिन रहा. इस दिन ट्रिपल का ही तलाक़ हो गया था. राज्यसभा से ‘मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक, 2019′ के पास होते ही तीन तलाक़ ज़ुर्म घोषित हो गया सदियों से सियासत की बेड़ियों में जकड़े इस मुद्दे को मोदी सरकार ने एक झटके में तोड़ दिया.
6- झारखंड चुनाव
झारखंड का चुनाव बेहद दिलचस्प रहा. चुनाव से पहले यहां बीजेपी और आजसू की 19 साल पुरानी दोस्ती टूटी और इसका परिणाम ये रहा कि, झारखंड में बीजेपी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई. रघुवरदास और कई बड़े नेता चुनाव हार गए, कांग्रेस-जेएमएम और राजद की तिकड़ी ने बीजेपी की जीत का सपना तोड़ दिया.
7- महाराष्ट्र में महासंग्राम
महाराष्ट्र के सियासी घटनाक्रम ने ये साबित कर दिया कि, राजनीति में ना कोई किसी का स्थाई दोस्त होता है ना दुश्मन, मौके की नज़ाकत पर जिससे दिल मिल जाए उससे हाथ मिलाया जा सकता है. भगवा ब्रिगेड वाली बीजेपी और शिवसेना में सीएम पद को लेकर ऐसा टकराव हुआ कि, 30 साल पुरानी दोस्ती भी टूट गई. एक समय ऐसा भी आया जब एनसीपी के समर्थन के भरोसे, रात के अंधेरे में देवेंद्र फड़णवीस ने सीएम पद की शपथ ले ली, लेकिन दिन के उजाले में वो समर्थन भी भरभरा गया. शरद पवार महाराष्ट्र की सियासत के सिंकदर बने और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे सीएम बन गए. कांग्रेस-शिवसेना और एनसीपी साल 2019 में सियासत के नए साथी हो गए.
8- जब चिंदबरम गए जेल
यूपीए सरकार में सबसे ताक़तवर नेताओं में शुमार रहे पूर्व वित्तमंत्री पी.चिदंबरम के लिए साल 2019 अर्श से फर्श सरीखा रहा. इस साल उनके सितारे ऐसी गर्दिश लाए कि, बड़ी सियासी साख वाले चिदंबरम, तिहाड़ तक जा पहुंचे. उनकी गिरफ्तारी को लेकर आदी रात तक फुल हाईवोल्टेज ड्रामा चला था. घर के दरवाजे बंद थे सीबीआई और पुलिस दीवारें कूद कर उन तक पहुंची थी. गिरफ्तारी के समय सड़क पर भी काफी बवाल हुआ था. आईएनएक्स मीडिया भ्रष्टाचार मामले में 21 अगस्त को गिरफ्तार किया था. चिदंबरम 106 दिन तक जेल में रहे.
9- मोदी 2.0
राजनीतिक नजरिए से 2019 बीजेपी के लिए ऐतिहासिक साल रहा. इस साल पीएम मोदी की ऐतिहासिक वापसी हुई. अद्भुत जीत के साथ केंद्र में फिर से बीजेपी की सरकार बनी. मोदी की दूसरी पारी को लोगों ने इसे नाम दिया मोदी 2.0, दरअसल, अप्रैल से मई तक देश में लोकसभा चुनाव का चुनावी महासमर था. पूरा विपक्ष बीजेपी को हराने में जी जान से जुटा था. लेकिन 23 मई को जब नतीजे आए तो विपक्ष धरायशी हो गया. मोदी-शाह की जोड़ी कमाल कर गई, इन नतीजों से हर कोई हैरान था क्योंकि, बीजेपी ने 300 सीटों का आंकड़ा पार कर दिया था और NDA को 350 से ज्यादा सीटें मिलीं. मोदी बनाम विपक्ष के महासंग्राम में मोदी को मिली थी महाजीत.
10- शाह भी पहुंचे संसद
अब इसे पहली पारी में अमित शाह की डबल सेंचुरी भी कहा जाए तो कहना गलत नहीं होगा. क्योंकि, एक तो अध्यक्ष के रूप में अमित शाह ने बीजेपी को फिर से विजेता बनाया और उधर पहली बार लोकसभा का चुनाव लड़े अमित शाह गांधीनगर सीट से लाखों वोट से जीतकर कर सांसद भी बने. मोदी 2.0 में गृहमंत्री बनने के बाद तो अमित शाह ने कई चौंकाने वाले दांव भी चले. सदन में भी शाह पूरे विपक्ष पर हावी रहते हैं.
11-राहुल की हार, प्रियंका का नया अवतार
कांग्रेस नेतृत्व के लिए इससे कठिन शायद ही कभी रहा हो. 2014 की हार के बाद 2019 की हार का दर्द कांग्रेस के लिए ज़्यादा गहरा रहा क्योंकि, पार्टी की करारी हार के साथ-साथ ख़ुद राहुल गांधी अपने गढ़ अमेठी में ही हार गए. 2014 में राहुल गांधी से हार चुकीं स्मृति ईरानी ने 2019 में राहुल गांधी से कांग्रेस का क़िला छीन लिया. अमेठी सीट से संजय गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी चुनाव जीत चुके हैं, 2004 से राहुल गांधी ही अमेठी से सांसद थे. इस हार से हताश राहुल गांधी ने कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. राहुल गांधी के इस्तीफे से कांग्रेसी कुनबे में भूचाल आ गया. कई दिन उनको मनाने की कोशिशें हुईं. लेकिन राहुल गांधी अध्यक्ष ना बनने पर अडिग रहे और तो और उन्होंने यहां तक कह दिया कि, अब गांधी परिवार से कोई अध्यक्ष नहीं बनेगा. नेतृत्व संकट के समय सोनिया गांधी फिर कांग्रेस की संकटमोचक बनीं. हालांकि, कांग्रेस के लिए 2019 में एक ख़ुशख़बरी रही कि, प्रियंका गांधी का भी एक्टिव पॉलिटिक्स में पदार्पण हो गया इससे पहले प्रियंका गांधी सोनिया गांधी और राहुल गांधी के प्रचार तक ही सीमित रहती थीं. प्रियंका गांधी ने सोनभद्र, उन्नाव, दलित उत्पीड़न और नागरिकता क़ानून जैसे मुद्दों पर अपनी मौजूदगी भी दर्ज कराई.
12.कर्नाटक का सियासी नाटक
साल 2019 सबसे ज्यादा सियासी उतार-चढ़ाव के लिए याद किया जाएगा और इन किस्सों में कर्नाटक का नाम भी भुलाया नहीं जा सकता. कर्नाटक में कांग्रेस और जेडीएस के मेलजोल की सरकार चल रही थी, लेकिन जुलाई में 17 विधायकों की बगावत ने स्थिर सरकार को अस्थिर कर दिया. कई दिन मान-मनौव्वल का खेल चला विधायकों की लुकाछिपी हुई. दोनों तरफ के विधायक राजस्थान से लेकर गोवा तक के रिसॉर्ट की सैर करते दिखे. विश्वासमत की बिसात पर कुमारस्वामी की सरकार 105 वोट के मुकाबले 99 वोट से गिर गई. बदले गुणा-गणित में येदुरप्पा कर्नाटक के मुख्मंत्री हो गए. 26 जुलाई 2019 को येदुरप्पा ने सीएम पद की शपथ ली. 17 अयोग्य विधायकों की सीट पर हुए उपचुनाव में कांग्रेस और जेडीएस ने एड़ी चोटी का जोर लगाया, उस वक्त महाराष्ट्र में बदले मिजाज के बीच येदुरप्पा की कुर्सी पर संकट दिख रहा था. लेकिन 17 में से 15 सीट जीतकर येदुरप्पा ने अपनी कुर्सी बचा ली.
13. बंगाल का सियासी बवाल
साल 2019 में पश्चिम बंगाल भी बेहद सुर्खियों में रहा. क्योंकि, यहां साल भर कोई ना कोई ऐसा सियासी घटनाक्रम चलता रहा जो चर्चाओं में रहा. बंगाल की सियासी जंग में जय श्रीराम का नारा भी खूब जोर शोर से गूंजा था. ममता बनर्जी ने बीजेपी को रोकना जहां साख का सवाल बना लिया था. वहीं बीजेपी किसी भी कीमत पर कमल खिलाने में लगी रही. हालात ऐसे बने कि, बात हिंसा तक पहुंच गई. लेकिन ‘चुपेचाप कमलछाप’ की नीति और रणनीति के जरिए बीजेपी ने ममता दीदी का किला भेद दिया. 2019 लोकसभा चुनाव के परिणाम आए तो केवल बीजेपी को छोड़कर सभी अचंभित रह गए. क्योंकि, बीजेपी ने बंगाल में 40 फीसदी वोट के साथ 18 सीटें जीत कर वो कर दिखाया था, जो बाकी राजनीतिक पार्टियों के लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन लग रहा था
14. फर्श से अर्श पर जगनमोहन
साल 2019 में 46 साल के जगनमोहन रेड्डी भी खूब सुर्खियों में रहे सब्र और संघर्ष की सियासत ने जगमोहन रेड्डी को फर्श से अर्श पर पहुंचा दिया. चंद्रबाबू नायडू को हराकर जगनमहोन रेड्डी आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. दरअसल, 2009 में पिता की मौत के बाद जगनमोहन रेड्डी ने राजनीति के मैदान में जो जद्दोजहद की वो अपने आप में किसी संघर्ष से कम नहीं है. 2009 में आंध्र प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. वाई.एस. राजशेखर रेड्डी की एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में मौत हो गई थी. इस मौत के बाद से ही उनके बेटे वाई.एस.जगनमोहन रेड्डी आंध्र प्रदेश में सियासी ख़ालीपन को भरना चाहते थे लेकिन कांग्रेस ने जगनमोहन रेड्डी को ही किनारे कर दिया था. कांग्रेस में मन मुताबिक तवज्जो नहीं मिली तो उन्होंने कांग्रेस से अलग राह चुन ली थी. 45 दिनों में अपनी नई राजनीतिक पार्टी गठन करने वाले जगन को जेल तक जाना पड़ा. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी, और 2009 से चले संघर्ष का फल उन्हें 2019 में आकर मिला.
15.सपा-बसपा का ऐतिहासिक गठबंधन
2019 में उत्तर प्रदेश की सियासत में सपा-बसपा ने नई इबारत लिखी थी. करीब 25 साल पुरानी दुश्मनी को भुलाकर दोनों दलों ने एक ऐतिहासिक गठबंधन में गांठ लगाई थी. गेस्ट हाउस कांड के बाद सपा-बसपा की दुश्मनी जगजाहिर थी, लेकिन 2019 के चुनाव में मायावती और अखिलेश यादव ने बीती ताहिं बिसार कर आगे की सुध लीं. उत्तर प्रदेश की राजनीति में ये वो संभव हुआ था, जो असंभव माना जाता था. हालांकि, इतिहास भुलाकर सपा-बसपा ने भविष्य का जो भूगोल बनाया था उसका तो गणित ही गड़बड़ा गया था. लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद गठबंधन का रिजल्ट ये हुआ कि, साइकिल और हाथी एक दूसरे के साथी नहीं रहे. बहन जी ने ऐलान कर दिया कि, अब हर छोटा बड़ा चुनाव वो अलग ही लड़ेंगी अखिलेश यादव ने भी अलग राह अपना लीं.
16-योगी का जादू
योगी आदित्यनाथ…सबको चौंकाकर उत्तर प्रदेश के सीएम बने, योगी आदित्यनाथ का जलवा 2019 में भी कायम रहा. 2019 में सीएम योगी आदित्यनाथ जहां अपने धुआंधार फैसलों के चलते चर्चाओं में रहे, वहीं लोकसभा चुनाव प्रचार में हर राज्य में सीएम योगी की डिमांड रही. गुजरात से कर्नाटक, बंगाल तक योगी-योगी के नारे गूंजे. वहीं भ्रष्ट नौकरशाही और कामचोर कर्मचारियों पर सीएम योगी की कार्रवाई भी नजीर बनी. भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए सीएम योगी ने कई अधिकारियों को जबरन रिटायरमेंट दिलवा दिया. अभी भी ऐसे अधिकारियों की लिस्ट अभी बन रही है.
- सियासत का जूता कांड
यूपी से बीजेपी सांसद के 7 जूतों की धमक, उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि दिल्ली तक सुनाई दी थी. 2019 की सियासत का ये वो जूताकांड था जिसने शरद त्रिपाठी का टिकट तक कटवा दिया था. दरअसल, मार्च की गरमी पड़ रही थीं. मौसम का पारा हाई था. माननीयों लोगों की मीटिंग चल रही थीं. इसी मीटिंग में संतकबीरनगर से बीजेपी सांसद शरद त्रिपाठी और बीजेपी विधायक राकेश सिंह बघेल का पारा भी चढ़ गया. बस फिर क्या, जिस वक्त पार्टी बूथ मजबूत करने में जुटी थी. उस वक्त सांसद महोदय, विधायक को पीट कर बता रहे थे कि, उनका बूट सबसे मजबूत.
18- मोदी का ध्यान, केदारनाथ
2019 में एक ध्यान ने सारी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. दरअसल, लोकसभा चुनाव प्रचार के बाद पीएम मोदी केदारनाथ की कंदरा में जा पहुंचे. लोकसभा चुनाव 2019 के नतीजों से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केदारनाथ की एक गुफा में ध्यान लगाया था. पीएम मोदी के इस ध्यान ने दुनियाभर में सुर्खियां बटोरी थीं और केदारनाथ की ये स्पेशल गुफा चर्चा में आ गई थी. 18 मई 2019 की शाम प्रधानमंत्री इस गुफा में पहुंचे थे, 19 मई की सुबह 7 बजे पीएम गुफा से बाहर निकले. पीएम के ध्यान लगाने के बाद से ही इस गुफा की बुकिंग हाउसफुल चल रही है. समुद्री तल से 12 हजार फीट की ऊंचाई पर मौजूद इस गुफा में वाई-फाई, फोन और बेड का भी इंतजाम है.
19.विवादों के ‘चैंपियन’
अक्सर विवादों में रहने वाले उत्तराखंड के खानपुर से विधायक कुंवर प्रणव सिंह चैंपियन 2019 में भी चर्चाओं में रहें. झबरेड़ा से विधायक कर्णवाल से कलह हो या फिर पत्रकारों को गाली, प्रणव 2019 में भी विवादों के चैंपियन रहे. कर्णवाल ने चैंपियन पर जान से मारने की धमकी का आरोप लगाया था तो वहीं एक पत्रकार को गोली मारने की धमकी और गालियां देते हुए उनका एक वीडियो सुर्खियों में रहा था. प्रणव की हनक और हथियारों के साथ हरकत ने आलाकमान को भी हलकान कर दिया था. प्रणव चैंपियन का तमंचे पर डिस्कों भी खूब चर्चाओं में रहा. परेशान होकर पार्टी ने प्रणव चैंपियन को 6 साल के लिए पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया.
