राम मंदिर मामले पर ढीले पड़े सुर, अब इस फैसले का है इंतजार

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नई दिल्ली : राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राम मंदिर निर्माण को लेकर बीजेपी सरकार पर जहां लगातार दबाव बना रहा था और साल के खत्म होने तक अध्यादेश लाने की सरकार को डेडलाइन दे रहा था उसी संघ ने इस मुद्दे पर अपने सुर नरम कर लिए हैं. जो संघ अब तक इस बात पर अड़ा था कि राम मंदिर निर्माण के लिए सरकार अध्यादेश ले आये उसी संघ परिवार के सदस्य अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतीक्षा करने की बात पर जोर देते दिखायी दे रहे हैं.

संघ के वरिष्ठ अधिकारी इंद्रेश कुमार ने कहा है कि “अभी हमने राम मंदिर निर्माण के लिए कोई टाइम टेबल तय नहीं किया है. पहले न्याय की प्रक्रिया तो तय हो जाए, टाइम टेबल भी तय हो जाएगा.” उन्होंने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट को इस मामले की सुनवाई शुरू करने और फैसला देने में अब देर नहीं करनी चाहिए.

वहीं जब तक मंदिर निर्माण के मुद्दे पर संघ के सुर में परिवर्तन नहीं आया था तब संघ और विश्व हिंदू परिषद ने सरकार के लिए 2018 के अंत तक की समय सीमा तय की थी. जिसके मुताबिक तय समय से पहले ही बीजेपी को अध्यादेश लाकर मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करना था. विहिप के कार्यकारी अध्यक्ष आलोक कुमार ने 18 नवंबर को दिल्ली में आयोजित धर्म संसद के बाद ही सरकार को अध्यादेश लाने वाली चेतावनी दी थी.

बीते 25 नवंबर को तो खुले तौर पर संघ के शीर्ष नेतृत्व ने सरकार से मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाने की मांग की थी. देश भर में आयोजित रैलियों के जरिये संघ ने 25 नवंबर को इस मुद्दे पर अध्यादेश लाने की बीजेपी सरकार से मांग की थी. बीजेपी सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने इस मौके पर कहा था कि मंदिर निर्माण ‘किसी भी कीमत पर होगा.’

बात यहीं नहीं रुकी एक और बीजेपी सांसद राकेश सिन्हा ने तो कानून बनाने के लिए राज्य सभा में प्राइवेट मेंबर बिल लाने का ऐलान तक कर दिया था. वहीं इस बारे में अगर सरकार के रूख की बात करें तो सरकार ने अध्यादेश लाने या कानून बनाने से साफ इनकार कर दिया है. जिससे राकेश सिन्हा भी प्राइवेट मेंबर बिल नहीं ला सके थे.

ऐसा नहीं है कि संघ राम मंदिर के जल्द बनाने के पक्ष में नहीं है क्योंकि इस बारे में लगातार बैठकें की जा रही हैं, चर्चाएं की जा रही हैं लेकिन ये जरूर है कि राम मंदिर निर्माण के लिए अध्यादेश लाने के मामले में संघ के सुर बदल गए हैं. राम मंदिर को लेकर संघ के सुर में परिवर्तन की वजह तलाशी जाए तो ऐसा करने में ज्यादा दिक्कत नहीं होगी. दरअसल, हाल ही में 5 राज्यों के विधान सभा चुनाव संपन्न हुए हैं. इन राज्यों में बीजेपी की करारी हार हुई और इस हार की वजह का संघ ने जब विश्लेषण किया तो उसे हासिल हुआ कि राम मंदिर मुद्दा वोट पाने के लिए उतना कारगर नहीं साबित हुआ जितनी उम्मीद जतायी गयी थी.

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कारणों के विश्लेषण में संघ ने पाया कि 35 साल से कम उम्र के मतदाताओं ने 1990 और 1992 में हुए राम मंदिर आंदोलन को नहीं देखा है. ऐसे में उन युवा मतदाताओं के बीच इस मुद्दे का असर नहीं हो रहा. अब संघ आम चुनाव को लेकर कोई रिस्क नहीं लेना चाहता और इसके लिए शायद बीजेपी सरकार पर कोई दबाव भी नहीं बनाना चाहता. यही वजह है कि संघ ने धीरे धीरे इस मुद्दे पर अपना रुख नरम कर लिया है.

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