दिवस, लौ और एक अभियान बनकर रह गई निर्भया?
संवेदनशीलता जब दम तोड़ने लगे तो सांसें हलक में अटकनी शुरू हो जाती हैं, बस समय की बात है कि आपकी बारी कब आती है. 5 साल का समय बीत चुका है लेकिन दर्द की वो आवाज आज भी दिल्ली हवाओं में गूंज रही है. कानून को फर्श से अर्श का सफर कराने के बाद फिर ये नइया मझदार में हिचकोले खा रही है. आगे से किसी भी लड़की के साथ दोबारा ऐसा वाक्या ना दोहराया जाए इसलिए ना जाने कितने सारे फंड को रिलीज किया गया है लेकिन क्या सारे फंड जमीनी हकीकत पर खरे उतर पाएं है.
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