एक लड़की एक रात अपने दोस्त के साथ घूमने निकली उसे क्या पता था, कि उसके साथ एक ऐसा दर्दनाक हादसा होगा जिससे सिर्फ उसका परिवार ही नहीं, एक देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लोगों की रूह कांप जाएगी. 6 साल पहले देर रात अपने दोस्त के साथ घर लौट रही एक लड़की दिल्ली की बस में चढ़ी उसे क्या पता था उस बस में हवस के शिकारियों द्वारा उसे निशाना बनाया जाएगा, इतना ही नहीं अपनी हवस पूरी करने के बाद उसके साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार किया जाएगा, जिसके बारे में कोई शख्स कल्पना तक ना कर सकें.
अपनी दरिंदगी दिखाने के बाद उन हैवानों ने उस लड़की को अधमरी हालत में चलती बस से सड़क के किनारे फेंक दिया. सड़क पर वो दर्द से कहराती रही लेकिन उस रात मरती इंसानियत की मदद की ने नहीं की उस घटना के बाद दकियानूसी सवालों ने उस दर्द को और गहरा कर दिया. दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 को हुई इस घटना के समय पूरा भारत हिंदु-मुसलमान होने के बजाय एक नारी के हक की लड़ाई लड़ने के लिए उसके साथ खड़ा हुआ. दिल्ली से लेकर चेन्नई तक लोगों ने पीड़िता को बचाने और कानून से उसके दरिंदों को सजा देने के लिए तरह-तरह के अभियान चलाए. रायसीना हिल्स (राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री कार्यालय) पर उमड़ी भीड़ में गुस्से का गुबार देखा गया था.
संवेदनशीलता जब दम तोड़ने लगे तो सांसें हलक में अटकनी शुरू हो जाती हैं, बस समय की बात है कि आपकी बारी कब आती है. 5 साल का समय बीत चुका है लेकिन दर्द की वो आवाज आज भी दिल्ली हवाओं में गूंज रही है. कानून को फर्श से अर्श का सफर कराने के बाद फिर ये नइया मझदार में हिचकोले खा रही है. आगे से किसी भी लड़की के साथ दोबारा ऐसा वाक्या ना दोहराया जाए इसलिए ना जाने कितने सारे फंड को रिलीज किया गया है लेकिन क्या सारे फंड जमीनी हकीकत पर खरे उतर पाएं है.
केंद्र सरकार ने जारी किया था फंड
मनमोहन सरकार ने रेप और अन्य तरह के हैरेसमेंट की शिकार महिलाओं की मदद के लिए 1,000 करोड़ रुपए के कॉरपस फंड से निर्भया फंड भी स्थापित कर दिया, लेकिन आज करीब 5 साल के बाद भी सरकार इस फंड का सही इस्तेमाल नहीं कर पाई है. इस फंड से रेप, डोमेस्टिक वॉयलेंस, एसिड अटैक और अन्य हिंसा की शिकार महिलाओं की आपतकाल में मदद की जानी थी. मगर अफसोस बाकि फंड की तरफ ये सिर्फ कागजों तक सीमित रह गया, सरकार ने पैसा तो दिया लेकिन जमीनी स्तर पर काम नहीं हो पाया.
3 साल तक फंड का इस्तेमाल नहीं
वर्ष 2013-14 और 2014-15 में इस फंड में 1000-1000 करोड़ रुपए केंद्र सरकार ने दिए, यही नहीं फंड बनने के तीन साल बाद तक इसका कोई इस्तेमाल ही नहीं हुआ. पुरानी कहावत है जब तक चोट नहीं लगेगी रास्ते से पत्थर नहीं हटाएंगे, खैर यहां पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. आखिरकार सरकार ने भी आवंटन घटाकर अगले दो साल 2016-17 और 2017-18 के लिए 550-550 करोड़ रुपए कर दिया. लेकिन इस आवंटन के बाद भी जब कोई काम होता नहीं दिखा और हल्ला मचा तो राजनेताओं ने इस तरह के पल्ला झाड़ा मानो उनकी कोई जिम्मेदारी ही नहीं बनती है. अगस्त 2017 में सरकार ने संसद में कहा कि केंद्र और राज्य के विभिन्न महकमों ने निर्भया फंड के इस्तेमाल के लिए 2209 करोड़ रुपए की 22 स्कीम्स के लिए दिशा-निर्देश दिए हैं, लेकिन अफसोस ये दिशा-निर्देश सिर्फ पानी में कागज की कश्ती ही साबित हुए.
कुल फंड का 90% रखा रह गया
पिछले 5 साल में कुल 3100 करोड़ रुपए के फंड के बाद अगर काम की बात करें तो धरातल पर सिर्फ 300 करोड़ रुपए की योजना की लागू की गई है. हालांकि निर्भया फंड की प्रगति के रिव्यू को लेकर पिछले महीने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में हुई विभिन्न मंत्रालयों की बैठक में स्पष्ट किया कि निर्भया मामले में ज्यादातर योजनाएं धरातल पर लागू होने के काबिल ही नहीं है.

बढ़ रही रेप की वारदात
प्रशासनिक अधिकारी बेशक से योजनाओं को जमीनी स्तर पर लागू करने की काबिल ना समझ रही हो लेकिन वर्ष 2012 से लेकर 2015 तक रेप और अन्य मामलों में बढ़ोतरी हुई है. भारत में रेप के मामलों की संख्या 24,923 थी, जो 2015 में 34,651 के पार चली गई, यहां पर एक बात गौर करने वाली है कि वर्ष 2016 व 2017 के आंकड़ें इसमें शामिल नहीं है.
गृह मंत्रालय के पास कुल निर्भया फंड के करीब आधे यानी 1100 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट हैं. इसमें 321 करोड़ रुपए की इमरजेंसी रिस्पॉन्स सपोर्ट सिस्टम (ईआरएसएस), 200 करोड़ रुपए की क्रिएशन ऑफ सेंट्रल विक्टिम कंपनसेशन फंड (सीवीसीएफ), 324 करोड़ रुपए की क्रिएशन ऑफ इनवेस्टिगेशन यूनिट्स फॉर क्राइम अगेन्स वुमन (आईयूसीएडब्ल्यू), 82 करोड़ रुपए की ऑर्गनाइज्ड क्राइम इनवेस्टिगेशन एजेंसी (ओसीआईए) और 195 करोड़ की साइबर क्राइम प्रिवेंशन अगेन्स्ट वुमन एंड चिल्ड्रन योजनाएं शामिल थीं.
हेल्पलाइन का तो अभी ट्रायल भी नहीं
गृह मंत्रालय के एक अधिकारी द्वारा दिए गए बयान के मुताबिक निर्भया फंड में से 321 करोड़ सिर्फ हेल्पलाइन नंबर को सक्रिय रूप से चलाने के लिए आवंटित की गई थी, लेकिन ताज्जुब की बात तो ये है कि 6 साल बीत जाने के बाद भी इस हेल्पलाइन सेवा का ट्रायल तक शुरू नहीं हुआ है.
साइबर सेक्सुअल हैरेसमेंट की दिशा तय नहीं
निर्भया केस में सेक्सुअल हैरेसमेंट को रोकने के लिए कई सारी दिशा-निर्देश तय किए गए. जिसमें महिलाओं को ऑनलाइन पोर्नोग्राफी, अश्लील मैसेज भेजने या साइबर सेक्शुअल हैरेसमेंट से बचाया जाने के लिए 195 करोड़ की राशि आवंटित की गई. इसके लिए एक ऐप डेवलप होना था लेकिन विकास या यूं कहें की सतर्कता की रफ्तार इतनी धीमी है कि इस दिशा में काम हो ही नहीं पाया है.
ये सारे आंकड़े देखकर तो साफ है कि हमारे प्रशासनिक अधिकारी इतने लापरवाह है कि एक और निर्भया केस होने का इंतजार कर रहे हैं. आंखे मूंद कर बैठे अधिकारियों को एक शायद एक और बलि का इंतजार है.
