13 दिसंबर 2001 का दिन भारतीय इतिहास में काले अक्षरों में दर्ज है. इस दिन को देश के लोग, राजनेता कोई भी नहीं भुला सकता. 17 साल पहले आज ही दिन आतंकियों ने भारतीय संसद को अपना निशाना बनाया था और हमला किया था. भारतीय संसद पर हमला करने की साजिश को आतंकियों ने बड़ी ही सफाई से अंजाम दिया था. आतंकी खामोशी से सफेद एंबेसडर में संसद परिसर में घुसे थे और 45 मिनटों में लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर को गोलियों से छलनी कर दिया था. इन गोलियों की आवाज ने न सिर्फ संसद परिसर में मौजूद नेताओं की रूह को कांपने पर मजबूर किया बल्कि पूरे देश की आत्मा को छलनी कर दिया.
आतंकियों ने संसद को उस वक्त निशाना बनाया था, जब संसद का शीतकालीन सत्र चल रहा था. विपक्ष के हंगामे के बाद संसद की कार्यवाही को 40 मिनट के लिए स्थगित कर दिया था. कार्यवाही के स्थगित होने के साथ ही प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और सोनिया गांधी अपने निवास के लिए निकल चुके थे, लेकिन संसद परिसर में अब भी केंद्रीय गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी समेत लगभग 200 सांसद मौजूद थे. जैसे-जैसे नेता बाहर आ रहे थे. मीडिया उनसे सवाल करने में लगी हुई थी. सुबह 11 बजे संसद के गेट नंबर 11 पर उपराष्ट्रपति कृष्णकांत शर्मा के कार के पास तैनात सुरक्षाकर्मी उनके आने का इंतजार कर थे. सुरक्षाकर्मी जब तक कुछ समझ पाते एक एंबेस्डर कार तेजी से उनकी तरफ आई और जब तक वह जवानों के इशारों को समझती उपराष्ट्रपति की गाड़ी, एंबेसडर से टकरा चुकी थी.
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एके-47 से लैंस थे आतंकी
उपराष्ट्रपति की कार और एंबेसडर के टकराने के बाद कोई कुछ समझ पाता इससे पहले ही एंबेसडर के चारों दरवाजे खुलते हैं और पांच आतंकी जिनके कंधों पर बैग है, हाथों में एके-47 थी, अंधाधुंध गोलियां की बरसात करने लगते हैं और कुछ ही पलों में पूरा संसद गोलियों की आवाज से गूंज उठता है. सुरक्षाकर्मी लगातार आतंकियों का सामना करते हैं, लेकिन बाकि लोगों इस गूंज को आतिशबाजी की आवाज समझ बैठते हैं. गोलीबारी के बीच ही एक धमाके की आवाज है और सबको लगता है कि अब संसद में कुछ गलत घटित हो चुका है. गोलीबारी से महज कुछ सौ मीटर की दूरी पर मौजूद गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को सीआरपीएफ के जवानों से हमले की जानकारी मिल चुकी थी, लिहाजा आनन-फानन में आडवाणी और रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीज जैसे कई नेताओं को सुरक्षित स्थानों पर लगे जाया गया. संसद के सभी दरवाजों को बंद कर दिया गया.

संसद परिसर में आतंकी जिस रफ्तार से गोली बरसा रहे थे और इधर-उधर घूम रहे थे, उसे देखकर सुरक्षाकर्मियों को इस बात का अंदेशा हो गया था कि उन्हें भवन के अंदर जाने का रास्ता मालूम नहीं है. आतंकी गोलियां बरसा रहे थे और सेना के जवान सभी दरवाजों पर अपनी पोजिशन में खड़े थे. अफरा-तफरी के बीच आतंकवादी जो गेट नंबर 1 की तरफ बढ़ा और सदन के अंदर प्रवेश करने की कोशिश करने लगा, हालांकि जवानों ने उसकी कोशिश को नाकामयाब कर दिया और गोलियों ने उसका सीना छलनी कर दिया.
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पहले आतंकी को जैसे ही जवानों ने निशाना बनाया और वो जमीन पर जा गिरा, तो सुरक्षाकर्मी उसे पूरी तरह से निशाने पर लेना चाहते थे, लेकिन उनके मन में एक डर था. डर होना भी लाजिमी थी, क्योंकि आतंकी ने पूरे शरीर पर बम बांधे हुए थे. जैसे ही आतंकी ने खुद को सेना से घिरा हुआ पाया, खुद को उड़ा लिया. एक बेशक मौत की नींद सो चुका था, लेकिन चार आतंकी अब भी संसद पर गोलियों की बारिश करने में लगे हुए थे. ऐसा लग रहा था मानो वह घंटों सिर्फ गोलियां बरसाने के लिए ही आए हैं. हर के शरीर पर सैकड़ों बम, ग्रेनेड और वो तमाम चीजें जिससे किसी को भी नुकसान पहुंचाया जा सकता है.
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गोलियं की गूंज के बीच बाकि के आतंकियों को अपने एक साथ ही मौत की खबर लग चुकी थी और वब घबरा गए थे. घबराहट के मारे आतंकवादी छिपने का ठिकाना ढूढने लगे और इसी बीच एक आतंकी ने खुद को रिमोट से उड़ा लिया. वहीं, दूसरी तरफ आतंकियों ने निपटने के लिए दिल्ली पुलिस की एक स्पेशल सेल की टीम संसद भवन के लिे रवाना हो चुकी थी. संसद परिसर में मीडिया के कैमरे मौजूद होने के कारण कुछ ही पलों में यह खबर देश तो क्या विदेशों तक पहुंच चुकी थी. स्पेशल सेल जब तक संसद पहुंचती उससे पहले ही सुरक्षाकर्मियों ने मोर्चा संभालते हुए गेट नंबर 5 पर एक आतंकी को ढेर कर दिया.

गेट नंबर 9 पर सिमट गया था ऑपरेशन
दो आतंकियों की मौत के बाद पूरा ऑपरेशन गेट नंबर 9 पर सिमट गया और गोलीबारी के बीच सेना के जवानों ने बाकि 3 आतंकियों को घेरकर ढेर कर दिया. अत्याधुनिक हथियारों से लैस फिदायीन हमलावरों के साथ मुठभेड़ में 9 लोगों की मौत हो गई थी. मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस के पांच जवानों, सीआपीएफ की एक महिला अधिकारी, संसद के दो कर्मी और एक माली की जान गई थी. आज संसद पर हमले की 17वीं पुण्यतिथि है.
