नई दिल्ली : साल 2018 ख़त्म हो चुका है और नया साल 2019 की शुरूआत हो चुकी है. सभी लोग नए साल के जश्न में डूबे हुए है. वैसे तो पूरी दुनिया में 1 जनवरी को ही नया साल मनाया जाता है लेकिन भारत में हिंदू कैलंडर के हिसाब से गुड़ी पड़वा के दिन साल का पहला दिन होता है औऱ लोग इसे भी नए साल के जश्न की तरह ही मनाते है. वैसे तो गुड़ी पड़वा के दिन नया साल मनाने का अपना ही धार्मिक महत्त्व है लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पूरे विश्व में 1 जनवरी को ही क्यों नए साल का जश्न मनाया जाता है. आज हम आपको इसके कारण और इतिहास बताने जा रहे है.
दरअसल 1 जनवरी को नया साल मनाने के पीछे कई कारण और मान्यताएं है. ऐसा माना जाता है कि जनवरी महीने का नाम रोमन के देवता ‘जानूस’ के नाम पर रखा गया था. वहीं मान्यताओं के अनुसार जानूस दो मुख वाले देवता थे जिसमें एक मुख आगे की ओर तो वहीं दूसरा पीछे की ओर था. बताया जाता है दो मुख होने की वजह से ही जानूस को बीते हुए कल और आने वाले कल के बारे में पता चलता था इसलिए देवता जानूस के नाम पर जनवरी को साल का पहला दिन माना गया और 1 जनवरी को साल की शुरुआत मानी गई और तभी 1 जनवरी को नए साल का जश्न मनाया जाने लगा है.
इसके अलावा और भी कई कारण है जिसकी वजह से 1 जनवरी को मए साल का जश्न मनाया जाता है. रोम के बादशाह जुलियर सीजर ने 45 ईसा पूर्व जुलियन कैलंडर बनवाया था तब से लेकर आज तक दुनिया के ज्यादातर देशों में 1 जनवरी को ही साल का पहला दिन माना जाता है. इसके पीछे कई खगोलीय कारण भी है जैसे 1 जनवरी के दिन पृथ्वी सूर्य के बेहद करीब होती है इसलिए भी इसे साल की शुरुआत कहा जाता है.
माना जाता है कि 31 दिसंबर को साल का सबसे छोटा दिन होता है और उसके बाद आने वाले दिन लम्बे होते है इसलिए 1 जनवरी को साल का पहला दिन माना जाता है. इसे ही साल की शुरुआत भी मानी जाती है.
अगर दुनिया में सबसे पहले नया साल का जश्न मनाने की बात करें तो यह 23 मार्च 2000 बीसी को मनाया गया था. यह जरुरी नहीं है कि दुनिया के सभी देशों में 1 जनवरी को ही नया साल मनाया जाता हो जैसे इजिप्ट और पर्सिया देशों में 20 सितम्बर को नया साल मनाया जाता है जबकि ग्रीक जैसे देश में 20 दिसंबर को नए साल का जश्न मनाने का रिवाज़ है.
