यूपी में 3 साल के लिए श्रम कानून समाप्त, मजदूर संगठन बोले अब मनमानी करेंगे ‘मालिक’

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लखनऊ: कोरोना काल में पहले नौकरियों पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं कहा जा रहा है कि, इस लॉकडाउन के चलते लाखों नौकरीपेशा लोग प्रभावित हो सकते हैं इसी बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने यूपी में  श्रम अधिनियमों में बदलाव करते हुए लेबर लॉ यानि श्रम कानूनों को निलंबित करने का फैसला लिया है. बता दें कि, ये बदलाव अगले 3 साल तक प्रभावी रहेंगे. कहा जा रहा है कि, सूबे में आर्थिक गतिविधियों को तेजी देने और नई कंपनियों को लुभाने के लिए ये फैसला लिया गया है.

 अध्यादेश में क्या है ?

इस अध्यादेश के मुताबिक नौकरी करने वाले लोगों को हटाने, नौकरी के दौरान हादसे का शिकार होने और समय पर वेतन देने जैसे तीन नियमों को छोड़कर बाकी सभी कानूनों को 3 साल के लिए स्थगित कर दिया गया है. सरकार के मुताबिक, लॉकडाउन के चलते जो कारोबीर गतिविधियां ठप हो गई है उनको दिशा देने के लिए ये कदम उठाए गए हैं.  औद्योगिक विकास मंत्री ने विभागीय समीक्षा में 38 नियमों के 3 साल तक निष्प्रभावी रहने का आश्वासन दिया.

क्या पड़ेग असर?

एक आंकड़े के मुताबिक श्रम विभाग में 40 से अधिक तरह के श्रम कानून हैं जिनमें बहुत सारे व्यर्थ हैं अब इस अध्यादेश के मुताबिक 1976 का बंधुआ मजदूर अधिनियम, 1923 का कर्मचारी मुआवजा अधिनियम और 1966 का अन्य श्रमिक निर्माण श्रमिक अधिनियम शामिल है. महिलाओं और बच्चों से संबंधित कानून जैसे मातृत्व अधिनियम, समान वेतन अधिनियम, बाल श्रम अदिनियम और मजदूरी भुगतान अधिनियम की धारा 5 को बरकरार रखा गया है इसके तहत 15000 से कम रुपए की आय वाले के वेतन से कोई कटौती नहीं की जा सकेगी.  वहीं अन्य श्रम कानून जो कि, औद्योगिक विवाद को निपटाने, श्रमिकों व ट्रेड यूनियनों के स्वास्थ्य और काम करने की हालत, ठेका और प्रवासी मजदूरों से जुड़ा है उन्हें तीन साल के लिए स्थगित कर दिया है.

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