जानिए ! अगर अमिताभ अग्निहोत्री जी पत्रकार ना होते तो क्या होते ?

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पिछले 23 वर्षों से पत्रकारिता में अहम जिम्मेदारियां निभा चुके वरिष्ठ पत्रकार अग्निहोत्री ने अपना उत्तर प्रदेश की टीम से बातचीत की. इस दौरान उन्होंने अपने जीवन से जुड़े कई रहस्यों का खुलासा किया. उन्होंने बताया कि अगर वह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता को करियर के तौर पर नहीं चुनते तो आज कहां होते…

सवाल:  उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद से लुटियन की दिल्ली तक पहुंचना और हिंदी पत्रकारिता में आज ये मुकाम हासिल करना आप अपने इस पूरे सफर को कैसे देखते है?

जवाब: देखिए करियर तो ऐसी चीज है जिसमें आप अनवरत एक यात्रा में रहते हैं यात्रा में होते हैं तो अच्छे बुरे तमाम पड़ाव आते हैं मैं जीवन को यात्रा के रूप में ही लेता हूं और फर्रूखाबाद से यहां तक आने की बात जो है मुझे लगता है कि, जब आप किसी छोटे शहर से देश की राजधानी दिल्ली या औद्योगिक राजधानी मुंबई में आते हैं तो आपके पास ‘भारत’ का तजुर्बा पहले से रहता है,और आप ‘इंडिया’ में आते हैं. ‘भारत-इंडिया’ दो विभाजन हैं देश में. तो आपका एक चिंतन जो है वो समग्र बनता है. एक कंपलीट थॉट प्रोसिस बनता है. आपने ‘भारत’ भी जिया और ‘इंडिया’ में आप खुद आ जाते हैं. तो आप भारत और इंडिया दोनों को जीने वाले आदमी बन जाते हैं आप केवल ‘भारत’ को देखेंगे तो भी एक पक्षीय रहेंगे और आप केवल ‘इंडिया’ में रहकर जीवन यात्रा समाप्त कर लेंगे तो भी एक पक्षीय रहेंगे. तब आपको भारत का अंदाज नहीं होगा और केवल भारत को जिएंगे तो इंडिया का अंदाज नहीं होगा. जब आप दोनों को जी लेते हैं तो आपके पास संपूर्ण देश की तासीर की समझ आ जाती है ऐसा मुझे लगता है।

सवाल: पुराने दौर की पत्रकारिता और आज के समय की पत्रकारिता में क्या फर्क महसूस करते हैं?

जवाब: मैं मानता हूं पत्रकारिता केवल पत्रकारिता है किसी दौर की हो,पत्रकारिता को अघर मैं एक लाइन में कहूं तो यह वो माध्यम है जो उन वर्गों-उन वर्गों की आवाज पहुंचाता है जिनकी आवाजा वहां तक नहीं पहुंच सकती, इसको और सरल करके कहूं जो तो गरीब है वंचित है उसकी आवाज आप सत्ताधीशों और व्यवस्था तक पहुंचाते हैं यही पत्रकार का काम भी होना चाहिए, पत्रकार की पार्टी केवल जनता होनी चाहिए कोई राजनीतिक दल नहीं, पत्रकार मूलत: जनता का वकील होना चाहिए फिर हर मसले पर हर अदालत में वो खड़ा हो जनता के लिए, मेरे हिसाब से पत्रकारिता की परिभाषा बस इतनी है. पत्रकारिता ना किसी जाति, मत, पंथ मजहब राजनीतिक विचारधारा इन सबसे परे चीज है पत्रकारिता केवल देश-समाज का वकील है उसी भूमिका में वो रहे तो कभी कोई समस्या आयेगी ही नहीं.

सवाल: आपकी आक्रामक शैली, ठेठ देसी अंदाज और आपके देसी उदाहरण आपको सबसे अलग बनाते है, कुछ अलग नहीं लगता क्या आप लीक से हटकर चलते हैं?

जवाब: नहीं नहीं,  लीक से हटना नहीं मैं इसे लीक पर चलना मानता हूं.  बहस ऐसी होनी चाहिए, इस अंदाज में होनी चाहिए इस भाषा में होनी चाहिए, जिस अंदाज और भाषा में देश सोचता है देश बात करता है. आप जब उसमें नाटकीयता लाएंगे तो आप आमजन से कट जायंगे उनको लगेगा कि ये किसी दूसरे ग्रह-उपग्रह का प्राणी है. जो बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है. हमारे मतलब की कोई बात नहीं कर रहा, जनता को उसकी बात उसके सुर में, उसकी बोली में चाहिए, उसकी बात उसके अंदाज में होनी चाहिए. आप देखते होंगे कि, जो आम जनता है वो अपने आक्रोश को कितने तीखे अंदाज में बयां करती है. आपको भी उस आक्रोश की तासीर स्टूडियो में लानी पड़ेगी, तब आप उसके सच्चे वकील के तौर पर खड़े होंगे.  इसलिए मुझे लगता है  कि, ये लीक पर चलना है. कोट-पेंट टाई में बैठकर एक अभिजात्य चेहरा इसकी भी जय उसकी भी जय कर रहा है. असल में ये लीक से हटना है.

सवाल: सर आपके शो में आपकी डिबेट में ननकू और रज्जाक नाम का जिक्र बार-बार आता है ये किरदार कैसे आए. क्या इनकी कोई कहानी है समाज से कोई ताल्लुक है?

जवाब:  नहीं- नहीं, ये ऐसे किरदार नहीं कि, मैं इन दोनों नाम के लोगों से कभी मिला हूं. बस बोलते-बलते ये नाम जहन मे आ गए. तब में समाचार प्लस में था तो अचानक ये दो नाम जुबां पर आए तो बोल दिए फिर तो ये नाम करीब-करीब हर शो में चलते रहे, फिर जनता ने भी इसे सिग्नेचर मान लिया. फिर भी मुझे लगता है ननकू रज्जाक इस भारत के दो प्रतिनिधि चेहरे हो सकते हैं. भारत की जो बहुसंख्यक आबादी है उसके ये रिप्रेजेटिव करेक्टर हो सकते हैं. सबसे बड़ी बात ये कि, दोनों नाम भारत की गंगा जमुनी तहजीब के भी रिप्रेजेटिव करेक्टर हैं ‘ननकू और रज्जाक’ .

सवाल: अगर अमिताभ अग्निहोत्री जी पत्रकार ना होते तो क्या होते ?

जवाब: मित्र ! वैसे तो ईश्वर जाने अगर पत्रकार ना होता तो क्या होता. लेकिन मुझे लगता है कि, अगर मैं पत्रकार नहीं होता तो मैं या तो वकील होता या अध्यापक होता ये दो पेशे मेरे लिए संतोष मन को संतोष देने वाले होते. छात्रों को पढ़ाता तो आत्मा को संतोष मिलता या अदालत में जरुरतमंदों को न्याय दिलाता. काम वही करता जिसमें मुझे लगता जनता के लिए लोगो के लिए कुछ कर पाया. अगर आपको ईश्वर ने आपको शरीर देकर इस धरती पर भेजा है तो आपका ये दायित्व है कर्तव्य है कि, आप अपने जीवनकाल में रिटर्न गिफ्ट लोगों को देकर देकर जाएं. जिन लोगों को हक नहीं मिलता उनकी मदद करने की छोटी सी भूमिका हम सबकी भी रहनी चाहिए. एक व्यक्ति पूरी दुनिया बदल देगा मैं ऐसा नहीं मानता और ना ही अपने वारे में कोई गलतफहमी पालता हूं लेकिन जितना कर सकता हूं उतना ईमानदारी से करुं ये मेरे लिए बहुत है.

 

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