तवायफ के कोठे से मिट्टी लाकर बनती है माता की प्रतिमा, तो वो भी हमारे समाज का हिस्सा ही हुई ना

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शाहरूख खान, ऐश्वर्या राय और माधुरी दीक्षित की सुप्रसिद्ध फिल्म देवदास हर किसी ने देखी होगी. शाहरुख के बचपन की प्रेमिका ऐश्वर्या (पारो) जब माधुरी दीक्षित (चंद्रमुखी) के कोठे पर माता की प्रतिमा के लिए मिट्टी मांगने आती है. फिल्म में दिखाए गए एक सीन ने हर किसी को बेशक हैरान कर दिया हो, लेकिन सच्चाई आज भी यही है कि माता की मूर्ति तवायफ के कोठे के आंगन की मिट्टी के बिना अधूरी है. शक्ति की आराधना के लिए कई लोग न जाने दुर्गा पूजा में कितनी बार सप्तशती के मंत्रों का जाप करते हैं. परन्तु इन मंत्रों के वास्तविक महत्व को समझते हुए भी समझना और दूजों को समझाना नहीं चाहते हैं.

हिंदू धर्म में शक्ति अर्थात दुर्गा और काली. काली-दुर्गा अर्थात प्रकृति. दक्षिण से लेकर पूरब तक यह शक्ति हर उस वस्तु में विराजमान है, जिसे हम पूजते हैं या फिर पूजने की इच्छा रखते हैं. आदिशक्ति दुर्गा पृथ्वी पर मौजूद जीव-जंतु, पेड़-पौधे, स्त्री-पुरुष सबमें शामिल है. सनातन धर्म में हर नारी को आदिशक्ति से जोड़कर देखा गया है. फिर चाहे वो बच्चे को पुचकारने वाली मां हो, ऑफिस में काम करने वाली युवती या फिर भरे बाजार बैठकर खुद को बेचने वाली स्त्री, जिसे समाज वैश्या कहकर बुलाता है.

हर स्त्री में आदि शक्ति विराजमान होने के बावजूद हम चौखट के अंदर रहने वाली मां को पूजते हैं, लेकिन चौखट की बाहर वाली स्त्री (वैश्या को) अति घृणित नजर से देखते हैं. अब इसे बिडंवना कह लीजिए या चौखट के बाहर बैठी महिलाओं की खुशकिस्मती मां दुर्गा की मूर्त बिना उसके आंगन की मिट्टी के बन ही नहीं सकती.

उत्तर भारत में शारदीय नवरात्र के दौरान रामलीला और पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा पूरे विश्व में प्रख्यात है. खासकर कोलकाता के दुर्गा पूजा पंडालों की भव्यता देखते ही बनती है. वैश्या के आंगन से मिट्टी लाकर मूर्ति का निर्माण करने की यह परंपरा लगभग 600 सालों से ज्यों की त्यों निभाई जा रही है. अब सवाल उठता है कि आखिरकार ये परंपरा क्यों और कैसे शुरू हुई.

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बांग्ला संस्कृति में मां की प्रतिमा का निर्माण करने के लिए 4 चीजों की अनिवार्यता कही गई है. पहली- गंगा घाट की मिट्टी, दूसरी- गो मूत्र, तीसरी- गोबर और चौथी- वैश्या के आंगन की मिट्टी. लोकमान्यता के अनुसार इस प्रथा का चलन इसलिए शुरू किया गया, क्योंकि वेश्यालाय के आंगन की मिट्टी सबसे शुद्ध मानी गई है. ऐसा इसलिए है क्योंकि जब कोई शख्स वेश्या के पास जाता है तो अपनी तमाम अच्छाई, असल गुण को दरवाजे के बाहर ही छोड़कर आता है. वेश्या के दरवाजे में घुसने से पहले उसके मन में सिर्फ एक ही बात रहती है, इसी वजह से तमाम शुद्धता और इच्छाशक्ति ही उसके घर में प्रवेश करती हैं और जहां पर एक मनुष्य को अपनी इच्छाशक्ति प्राप्त हो, उससे पवित्र स्थान कोई और हो ही नहीं सकता.

पौराणिक मान्यता के अनुसार, प्राचीन काल में बंगाल की एक वेश्या की भक्ति से प्रसन्न होकर मां दुर्गा से उसे दर्शन दिए थे. इस दौरान वेश्या ने मां से समाज में जो एक आम स्त्री को सम्मान और प्यार मिलता है, इसके लिए वरदान मांगा था. तब मां ने कहा था कि तुम्हारे दरवाजे पर पुरुष सिर्फ विलास की कामना से आता है, इसलिए तुम्हें एक आम स्त्री की तरह दर्जा देना तो असंभव है, लेकिन मेरी पूजा तेरे आंगन के बिना अधूरी रहेगा. कहा जाता है कि माता की इसी आशीर्वाद से दुर्गा की मूर्ति वेश्या के आंगन की मिट्टी के बिना अधूरी है.

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पापों से मुक्ति दिलाएगी मिट्टी
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि जिन महिलाओं खुद अपने जीवनयापन के लिए इस व्यापार को चुनती हैं वह पाप की भागीदार होती हैं. ऐसे में उन्हें पाप से मुक्ति दिलाने के लिए उनके आंगन की मिट्टी लेना अनिवार्य है.

माता की प्रतिमा में तवायफ के आंगन की मिट्टी मिलाते वक्त समाज के मूर्तिकार और कोठियों में रहने वाले रसूखदार बड़ा ही गौरव महसूस करते हैं, लेकिन वही तवायफ जब आंगन से उठकर उस पूजा में शामिल होने के लिए जाती है तो उसे दुदकार दिया जाता है. कोई कहता है कि वैश्यों की एक खास जगह होती है, अगर वह वहां से बाहर निकलती हैं तो समाज गंदा होता है. तवायफ को मलीन कहने वाले लोग ये क्यों भूल जाते हैं कि अगर वह मलीन हुई तो आपके परिवार का हर सदस्य मलीन हुआ. क्योंकि जिस माता के चरणों में आप सिर झुका रहे हैं वह उसी मलीन के आंगन की है.

तवायफ को गंदा कहने वाले लोग अक्सर इस बात को भूल जाते हैं कि उन्हें जगह भी इसी समाज ने दी है. अगर कोई ठाकुर या अन्य ऊंची जाति के पुरूष उनकी बोली नहीं लगाएंगे, तो वह कभी भी बेची नहीं जाएंगी. पुरानी कहावत है जब तक खरीददार नहीं मिलता, एक कुम्हार भी घड़े का निर्माण नहीं करता. मानते हैं कि वक्त के साथ-साथ लोगों में तवायफों को हीन भावना से देखने की संख्या कम हुई है, लेकिन आंकड़ा अब भी बड़ा है. हम आंगन की मिट्टी को तो नतमस्तक करने को तैयार हैं, लेकिन उस देवी को नहीं जिसको वो आंगन है. समाज के इस दोगले चेहरो को समझाना अंतरिक्ष में किसी तारे को खोजने के समान है.

खैर मेरी विनती इस समाज से सिर्फ इतनी है कि वो वेश्याओं को भी उसी नजर से देखे, जिस नजर से बाकि महिलाओं को देखता है. उसे भी हक है कि वो समाज में सम्मान पाए, क्योंकि हम उसके जिस्म की बोली लगा सकते हैं, आत्मा की नहीं. जैसे दिखावे के लिए माता की मूर्ति की तो पूजा कर सकते हैं, लेकिन उनके प्रति ह्रदय से प्रेम भाव नहीं जगा सकते हैं. क्योंकि माता ने अपने उस भक्त को तिरस्कार से बचाने के लिए इस वरदान से आशीर्वादित किया था. माना की वेश्या प्रथा समाज और देश के हितों के लिए अच्छी नहीं है, लेकिन इसको खत्म करने की शुरुआत भी हमें ही करनी होगी. अगर आज एक वेश्या चौखट से बाहर निकलकर एक आम स्त्री की तरह नौकरी करके जीवनयापन करने की कोशिश करे तो उसे हीन नहीं बल्कि सम्मान के भाव से देखना चाहिए.

लेखक- आशु कुमार दास

(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)

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