44 बार जेल जा चुके हैं टिकैत, पुलिस में करते थे नौकरी, जानिए कैसे बने किसान नेता

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लखनऊ/दिल्ली: 26 जनवरी को हुए बवाल के बाद जिस तरह से पुलिस ने मोर्चा संभाला था उस समय तो लगा कि, करीब 2 महीने से चल रहा आंदोलन अब 2 घंटे भी नहीं चल पाएगा. क्योंकि शासन प्रशासन ने किसानों को खदेड़कर गाजीपुर का धरना स्थल खाली कराने की पूरी तैयारी कर ली थी. लेकिन भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता और इस किसान आंदोलन के एक प्रमुख चेहरे राकेश टिकैत ने पूरी कहानी ही पलट दी.

कैसे पलट गई बाजी

दरअसल, 28 जनवरी की देर शाम पुलिस ने गाजीपुर में अपनी घेराबंदी तेज कर दी. रात होने पर इलाके की लाइट काट दी गई और किसानों का आऱोप है कि, पीने का पानी और बाक सारी सुविधाएं भी रोक दी गईं. एसएसपी गाजियाबाद और जिलाधिकारी मौके पर पहुंचे भारी पुलिस बल की मौजूदगी को देखक हर कोई कह रहा था कि, अब किसी भी वक्त पुलिस का एक्शन होगा और किसानों को जाना होगा. लेकिन किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने माइक संभाला तो माहौल ही बदल दिया. इस तरह से आंदोलन का अंत होता देख राकेश टिकैत फफक-फफक कर रो पड़े. राकेश टिकैट ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि,

‘प्रशासन ने किसानों को अपने जाल में फंसाया. हिंसा से आंदोलन को तोड़ने की साजिश रची गई है. अगर सरकार को इस आंदोलन को नहीं चलने देना है तो यहां से हमें गिरफ्तार करे. किसानों को दिल्ली के चक्रव्यूह में फंसाया गया ‘अगर तीनों कृषि कानून वापस नहीं होते हैं तो मैं आत्महत्या कर लूंगा. मुझे कुछ भी हुआ तो प्रशासन जिम्मेदार होगा.मैं किसानों को बर्बाद नहीं होने दूंगा. किसानों का मारने की साजिश रची जा रही है. यहां अत्याचार हो रहा है. सभी सुविधाएं हटाए जाने से नाराज टिकैत ने कहा, मैं गाजियाबाद का पानी नहीं पीऊंगा. गांव के लोग पानी लेकर आएंगे तब मैं पीऊंगा’ ।

44 बार जेल गए राकेश टिकैत

भारतीय किसान यूनियन के महासचिव धर्मेंद्र मलिक के मुताबिक किसानों की लड़ाई के चलते राकेश टिकैत 44 बार जेल जा चुके हैं. मध्यप्रदेश में  भूमि अधिग्रहण कानून के खिलाफ उनको 39 दिनों तक जेल में रहना पड़ा था. इसके बाद दिल्ली में संसद भवन के बाहर हरियाणा और राजस्थान के किसानों के लिए भी टिकैत जेल तक गए हैं. अब एक बार फिर मामला दर्ज किया गया है ।

पुलिस से पॉलिटिक्स तक…

दरअसल, राकेश टिकैत साल 1985 में दिल्ली पुलिस में बतौर कांस्टेबल भर्ती हुए थे. कुछ वक़्त बाद उनका प्रमोशन हुआ और वे सब-इंस्पेक्टर बने. लेकिन उसी दौर में बाबा टिकैत का आंदोलन अपने चरम पर था. वे किसानों के लिए बिजली के दाम कम करने की मांग कर रहे थे. सरकार उनसे परेशान थी क्योंकि उन्हें बड़ा जन-समर्थन प्राप्त था. उसी समय राकेश टिकैत पर अपने पिता से आंदोलन ख़त्म कराने का दबाव बनाया गया. लेकिन राकेश टिकैत ने नौकरी छोड़कर पिता के आंदोलन में शामिल होने का निर्णय लिया.”

 

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