BA, BBA, MA, B.ed  जैसी डिग्री होल्डर मनरेगा में कर रहे मजदूरी

अपना बुलंदशहर होमपेज स्लाइडर

बुलंदशहर : कोरोना काल में हुए लॉकडाउन के चलते बड़े शहरों से पलायन करके अपने पैतृक गांव पहुंचने वाले श्रमिकों के लिए फिलहाल सरकार की मनरेगा योजना ही महज एक सहारा बनी हुई है. शहरों से बेरोजगार हुए श्रमिक गांवो में जाकर मनरेगा के तहत काम करके अपने परिवार का भरण पोषण कर रहे हैं. और इसी पर हमारी टीम ने बुलंदशहर में ग्राउंड ज़ीरो पर पहुंचकर एक पड़ताल की, जिसमें सामने आया कि किस तरह इस कोरोना ने शिक्षित वर्ग को भी मज़दूरी करने के लिए मजबूर कर दिया.

पढ़े लिखे लोग कर रहे मजदूरी

कोरोनावायरस संक्रमण के चलते देशभर में जारी लॉकडाउन ने पूरे देश में बेरोजगारों की इतनी बड़ी खेप खड़ी कर दी है कि देश का कोई कोना इससे अछूता नहीं रहा. इस लॉकडाउन के चलते केवल असंगठित क्षेत्र के मजदूर ही बेरोजगार नहीं हुए, बल्कि कोरोना काल में शिक्षित वर्ग पर भी बेरोजगारी की जमकर मार पड़ी है. लॉक डाउन के दौरान बड़े शहरों से अपने गांवो की ओर कूच करने वाले मज़दूरों को सरकार की मनरेगा योजना से बहुत आस बंधी हैं. और इसी पर हमारी टीम बेरोजगारी की पड़ताल के लिए बुलंदशहर में ग्राउंड ज़ीरो पर पहुंची. यहां हमारे सामने जो सच आया, वो ना सिर्फ़ हैरान करने वाला था, बल्कि यह साफ़ कर देने वाला था, कि कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए लगाए गए लॉक डाउन ने लोगों के सामने कितना बड़ा आर्थिक संकट खड़ा कर दिया है. हमारी टीम ने यहां पाया कि लॉक डाउन के दौरान बेरोजगार होने वाले पढ़े-लिखे लोग भी मनरेगा के तहत मज़दूरी करने को मजबूर हैं. हमारी टीम को जुनेदपुर ग्राम पंचायत में चल रही मनरेगा की साइट पर कई ऐसे बेरोजगार मिले जिन्होंने माता-पिता का नाम रोशन करने के लिए यूं तो ख़ूब पढ़ाई की, मगर भारत को कई ज़ख्म देने वाले कोरोना की वजह से इनका परिवार भी इस क़दर आर्थिक दिक्कतों से जूझने लगी कि मज़बूरन इन लोगों को अपनी डिग्री-डिप्लोमा ताक पर रखकर फावड़ा उठाना पड़ा.

डिग्री होल्डर छात्र चला रहे फावड़ा

मनरेगा के तहत चकरोड बना रहे BA, BBA, MA B.ed जैसी डिग्री होल्डर छात्र अपने सपनों को बुलाते हुए मजदूरी कर परिवार का भार संभाल रहे हैं. इन मनरेगा मज़दूरों की ओर से बताया गया, कि लॉकडाउन से पहले इनमें से कुछ लोग तो अलग-अलग शहरों में स्थित निजी कंपनियों में नौकरी कर रहे थे, जबकि कुछ को नौकरी की तलाश थी. मगर इस बीच देश में हुए लॉक डाउन ने ना सिर्फ़ इनकी तमाम उम्मीदों पर पानी फेर दिया, बल्कि इन्हें पूरी तरह बेरोजगार कर दिया. और दो वक़्त की रोटी के लिए मजबूरन अब इन जैसे कई शिक्षित बेरोज़गार युवाओं को वापस गांव आकर मनरेगा के तहत मज़दूरी करनी पड़ रही है. ग्राम प्रधान और सचिव की ओर से भी दावा किया गया कि सिर्फ यही नहीं बल्कि इनके जैसे दर्जनों डिग्री-डिप्लोमाधारी महज 201 रुपये की दिहाड़ी पाने के लिए हर रोज़ मनरेगा में मज़दूरी के लिए आवेदन कर रहे हैं. जिन्हें नियमानुसार कार्य देने की योजना तैयार की जा रही है.

 200 रुपए मजदूरी करने को मजबूर

हमारी इस पड़ताल में साफ़ हो गया कि शहरों से पलायन कर गांव गए कितने ही शिक्षित बेरोजगारों को भी मनरेगा की 200 रुपये तक मिलने वाली दिहाड़ी के भरोसे जीवन यापन करना पड़ रहा है. जबकि हमारी ग्राउंड रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि लॉकडाउन और करो ना ने पूरी तरह शिक्षित युवाओं की कमर तोड़ दी है और वह मजबूरन मजदूरी कर रहें हैं ताकि उनका परिवार 2 वक़्त की रोटी टाइम पर खा सकें. शिक्षित मजदूर पूरी तरह से सरकार की इस मनरेगा योजना से खुश है उनका कहना है सरकार ने बेहद अच्छी यह मुहिम चलाई है जिससे हमें घर बैठे रोजगार मिल रहा है जब तक यह कोलन अकाल खत्म नहीं हो जाता हम लोग कम से कम अपने परिवार को दो वक्त की रोटी तो दे पा रहे हैं सभी ने सरकार का शुक्र अदा करते हुए कहा कि जब तक सब कुछ पहले जैसा नहीं हो जाता है हम गांव में रहते हुए ही मनरेगा के तहत मजदूरी करेंगे.

अपना उत्तर प्रदेश के लिए बुलंदशहर से वरिष्ठ संवाददाता समीर अली की रिपोर्ट

 

 

 

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *