गोरखपुर: इस कोरोना काल ने हंसती खेलती इंसानी जिंदगियों को घरों में कैद कर दिया है, सबकुछ बंद है, ना कोई शोर ना कोई संग्राम वहीं लॉकडाउन में प्रकृति का भी निखरा हुआ रूप सामने आया है. इस पूरे बदलाव को अपने शानदार शब्दों में पिरोया है गोरखपुर की कलमकार सुगन्धा त्रिपाठी ने…।
मानव है आज घर के भीतर
बाहर पशु है तितर-बितर
काल कराता हमको ज्ञान
समय ना रहता एक समान
स्वच्छ हुई हवा धरती की
निर्मल हुई जल धारा
पछताना ना पड़े फिर से
काम ना करना ऐसा दोबारा
एक तरफ कोरोना से हाहाकार
दूजी तरफ दूर से दिखता धौलाधार
सोचो-सोचा कितना किया है
हमने अपनी प्रकृति से खिलवाड़…
आगे ना बढ़ जाएं हम सब भूलकर
इस वेला से ये सीख लेकर
अपनी प्रकृति का करें सम्मान
क्योंकि समय ना रहता एक समान
सुगन्धा त्रिपाठी, गोरखपुर
