उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से करीब डेढ़ दर्जन से ज्यादा सीटों पर मुस्लिम मतदाता हार जीत का माद्दा रखता है. लेकिन 2014 के चुनाव में वो देखने को मिला जो आजादी के बाद से अब तक नहीं दिखा था. अचंभे ही की बात थी कि, 2014 के चुनाव में उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम सांसद जीतकर लोकसभा नहीं पहुंचा. अब 2019 के चुनाव में फिर से मुस्लिम वोटों को लेकर सियासी दलों ने गुणा-गणित शुरू कर दिया है. मुस्लिम वोटों की लामबंदी के लिए बीजेपी का डर दिखाना गैर बीजेपी दलों का पुराना ढर्रा है. लेकिन क्या मुस्लिम मदताता इस ढर्रे से बाहर निकलेंगे ये भी बड़ा सवाल है. क्योंकि, अगर ऐसा नहीं हुआ तो इस बार फिर मुसलमानों के सियासी मुकाम की तलाश अधूरी ही रहेगी. और दूसरे दलों के भ्रम में लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व पर्याप्त मात्रा में शायद ही हो पाए.
सियासी अछूत बनने से बचना होगा

2014 जेसे हालात 2019 में भी होंगे मेरा ये कहना केवल कयासभर नहीं है. बल्कि बीते चुनावों के विश्लेषण पर है. वरना क्या कभी ऐसा हो सकता है कि, जिस प्रदेश में करीब 3.48 करोड़ मुस्लिम मतदाता हों और देश की सबसे बड़ी पंचायत में उनका कोई नुमाइंदा ना हो.
भ्रम और भेड़चाल से बचना होगा
2019 के चुनाव में मुसलमानों को इस पर गंभीरता से सोचना होगा. सियासी भ्रम और भेड़चाल से निकलकर वोट का सही इस्तेमाल करना होगा. मैं आजतक एक बात नहीं समझ पाया कि, मुस्लिम मतदाता फुटवाल सरीखे क्यों बने रहते हैं. गैर बीजेपी दल उन्हें बीजेपी का डर दिखाकर इस पाले से उस पाले ढकेलते रहते हैं. उनके नाम पर सियासी रोटियां सेकते हैं. जबकि, मुसलमानों को चाहिए कि, जो उनके मुद्दों पर ठोस बात करे, जो उनके साथ दिखे, वो उसके साथ चलें चाहें वो बीजेपी ही क्यों ना हो. केवल गैरबीजेपी दलों के वोटबैंक के ठप्पे ने भी मुसलमानों का बहुत नुकसान किया है. ऐसे में होता ये है कि, गैरबीजेपी दल मुस्लिमों को डर दिखाते हैं फिर बीजेपी या उसके सरीखे दल ध्रुवीकरण जेसे मुद्दों से चुनाव को अलग दिशा दे देते हैं. उससे मुसलमानों और बीजेपी जैसे दलों के बीच बिना वजह एक खाई बढ़ती चली गई. अगर मुस्लिम वोट ये जता दे कि, वो अपने मुद्दे और अपने हक की बात उठाने पर बीजेपी के साथ भी खड़े हो सकते हैं तो बाकी दल उन्हें केवल वोट बैंक नहीं समझेगें.केवल समीकरण समझने की भूल कभी नहीं करेंगे.
मजहब मुखर और मुद्दे मौन
मुस्लिम वोटरों को सियासी दलों ने केवल समीकरण के केंद्र में रखा. उनके वोट का जोड़ घटा कर अपना गणित सीधा किया. बीजेपी बनाम गैरबीजेपी में हुआ ये कि, मुस्लिमों के असली मुद्दे मौन हो गए और धर्म और मजहब ही मुखर रहे. चुनावों में मुस्लिम के नाम पर मंदिर मस्जिद के मुद्दे तो खूब उठे लेकिन उनकी सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुविधाएं, रोजगार जैसे मुद्दे कहीं पीछे छूट गए. और यही वजह रही कि, मुस्लिम विकास की दौड़ में भी पिछड़ते चले गए. क्योंकि, मजहब के शोर में मुद्दों की बात ना तो वो खुद कर पाए और सियासी दलों ने तो चुप्पी ही साध ली.
खेमेबाजी और खीचतान से खासी फजीहत
सियासी शून्य पर खड़े मुस्लिमों की हालत के लिए राजनीतिक दलों से ज्यादा वो खुद भी दोषी हैं. वोटों के बिखराव ने उनका बिखराव किया. आपसी खेमेबाजी और सियासी दलों की खींचतान ने भी कहीं का नहीं छोड़ा. 2014 के लोकसभा चुनाव की बात करें तो करीब 43 मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में थे. इनमें सपा ने 13 कांग्रेस ने 11 और बसपा ने 19 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था लेकिन एक-एक सीट पर 3-4 मुस्लिम उम्मीदवार उतरने पर मुस्लिम मतदाताओं को वोट बंटाऔर जीत का सेहरा किसी और के सिर बंधा. जबकि उस वक्त में मुस्लिम समाज के सझदार लोगों को आगे आकर अपना हक और अपने मुद्दों की बिसात पर एक ही जगह वोट देने कोशिश करनी चाहिए चाहें वो किसी दल का हो. बात-बात पर फतवा देने वाले मुस्लिम धर्मगुरुओं को भी ये समझना और समझाना चाहिए कि, वोट के सही इस्तेमाल के लिए भी कोई फतवा जारी करें.
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम समीकरण
22 करोड़ की आबादी वाले उत्तरप्रदेश में मुस्लिम की संख्या करीब 3.84 करोड़ है. यानि प्रदेश की कुल आबादी का 19-20 फीसदी. अब मुस्लिम बहुल सीटों की बात करें तो रामपुर, मुरादाबाद, बिजनौर, अमरोहा, कैराना, मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, मेरठ, बुलंदशहर, गाजियाबाद, कानपुर, बरेली, संभल, बदायूं, मऊ, बलरामपुर, बहराइच, आजमगढ़ और बाराबंकी जैसी तमाम सीटें हैं. इन जिलों में मुस्लिम आबादी के आंकड़ों पर नजर डालें तो रामपुर में 50.57 फीसदी, मुरादाबाद में 47.12, बिजनौर43, सहारनपुर 42, मुजफ्फरनगर 42, अमरोहा 40, बलरामपुर में 37प्रतिशद मुस्लिम हैं. बाकी करीब 21 जिलों में ये आंकड़ा 20 प्रतिशत से अधिक है. यूपी के ललितपुर में सबसे कम मुस्लिम आबादी है. वहीं रामपुर मुरादाबद में सबसे ज्यादा. मुरादाबाद लोकसबा क्षेत्र में सबसे ज्यादा तीम मुस्लिम विधायक हैं.
इस बार भी लगी है नजर
राजनीति दलों की नजर इस बार भी मुस्लिम वोटों पर जमी है. गैर बीजेपी दलों की बात करें तो सपा-बसपा के गठबंधन के समीकरण का सार ही दलित-मुस्लिम और यादव है. हालांकि, इस बार भी मतदान से पहले ही चुनाव को मजहबी रंगदेने की कोशिश की गई, मुस्लिमों की सहानभुति के लिए चुनाव की तारीख और रमजान का हवाला दिया गया लेकिन मुस्लिमों ने बड़ी सझदारी से उस जाल को कुतर दिया. एक बात ये बी हैकि, बीजेपी के लिए मुस्लिम और मुस्लिमों के लिए बीजेपी भी पिछले चुनाव से अछूत नहीं रही है. बीजेपी जहां तीन तलाक और सबका साथ सबके विकास में सभी को साथ लेकर चलेन की बात कर रही है, वही मुस्लिम समाज का एक बड़ा वर्ग भी बीजेपी की तरफ आकर्षित हुआ है. देखना होगा कि, 2014 के मुकाबले 2019 में मुस्लिमों के सियासी मुकाम की तलाश कितनी पूरी होती है.
(साजिद अली राणा, युवा पत्रकार)
(ये लेखक के स्वतंत्र विचार हैं)
