भारत में मंदिर मस्जिद पर राजनीति का चलन कई दशकों से चला आ रहा है. अधिकतर राजनेता इस पर चुनाव के समय गंभीरता दिखाते हैं, बड़े-बड़े भाषण देते हैं और सुर्ख़ियों में बने रहते हैं. आज वही माहौल देश में बना हुआ है. 29 अक्टूबर को उच्च न्यायालय में मंदिर-मस्जिद मुद्दे पर सुनवाई का दिन है. यह संयोग तो नहीं हो सकता कि देश में आम चुनाव से ठीक पहले ही मंदिर मुद्दे की सुनवाई हो रही है क्योंकि देश के 5 राज्यों में अगले महीने चुनाव (मतदान) होना है. ज़ाहिर है, लोगों को लुभाने और आकर्षित करने के लिए यह सब गाथा बुनी गयी है.
2014 चुनावों के समय उठा था मुद्दा
सभी को याद होगा कि 2014 आम चुनाव के समय भी इस मुद्दे को ज़ोर शोर के साथ उठाया गया था, उस वक़्त भी यही लग रहा था जैसे सत्ता में आते ही मंदिर निर्माण शुरू हो जायेगा लेकिन केंद्र के बाद राज्य की सत्ता मिलने के बाद भी मामला उलझा हुआ ही है. अब फिर चुनाव जीतना है तो मंदिर राग अलापना ही पड़ेगा अन्यथा प्रवीण तोगड़िया ने हाल ही में अयोध्या में कहा था कि ‘मंदिर नहीं तो वोट नहीं’. जिससे साफ़ ज़ाहिर है कि आज तक मंदिर के नाम पर केवल राजनीति और मतदाताओं से झूठे वादें करना ही राजनैतिक पार्टियों का लक्ष्य रहा है. जिसमें वह काफी हद तक सफल हुई है.
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राजनीतिक लाभ उठाने में जुटी पार्टियां
अब भी उसी मानसिकता के अनुसार मंदिर मुद्दे का रजनीतिक लाभ उठाने के लिए पार्टियां मेहनत कर रही है. अगर उच्च न्यायालय इस मुद्दे पर कोई बड़ा फैसला देता भी है तो भी मंदिर निर्माण में समय लगेगा. सीधा सा मतलब है कि इस बार भी लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ ही किया जायेगा. हाल ही में कुछ मुस्लिम लोगों ने मंदिर को ही विवादित ज़मीन पर बनाये जाने की बात कही है, इसमें सबसे आगे शिया वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिज़वी है. जिन्होंने अपना पूरा समर्थन मंदिर निर्माण को दिया है. उनके इस सहयोग और सत्ता के होते हुए भी मामला अधर में लटका हुआ है. जबकि वसीम रिज़वी से अलग बहुत से मुस्लिम लोगों का मानना है कि विवादित ज़मीन पर कोई अस्पताल या विश्वविधालय का निर्माण कराया जाये, जिससे कि दोनों ही वर्ग के साथ-साथ अन्यवर्ग भी इस ज़मीन से लाभ उठा सकें.
इस बात से ही समझा जा सकता है की केवल कुछ मुस्लिम को छोड़ कर सभी मुस्लिम अमन एवं शांति चाहते हैं. अगर उनको और समझाया जाये तो संभव है की वह मंदिर निर्माण को भी तैयार हो जाये. इसलिए राजनैतिक हस्तक्षेप को छोड़कर भी शायद मंदिर निर्माण आपसी सहमति से कराया जा सकता है. यहां ज़रूरत है मुस्लिम समाज को भरोसे में लेने कि न की गिरिराज जैसे नेताओं के भड़काऊ बयांन देने की. इस तनाव और नफरत को दूर करके ही सदभावना स्थापित किया जा सकता है और वैसे भी नफरत न तो मस्जिद का सन्देश है और न ही मंदिर का. इसलिए मंदिर बनने से पहले दोनों वर्गों को आपसी नफ़रत को ख़त्म करना चाहिए, जिससे कि स्थान किसी को भी मिले परन्तु प्रेम का सन्देश और आपसी भाईचारा सदैव बना रहे क्योंकि और भी मुद्दे हैं इस देश में मस्जिदों-मंदिर के सिवा.
