सवाल आरक्षण : सवर्णों देना कितना सही कितना गलत

अपना लखनऊ ब्लॉग होमपेज स्लाइडर

लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने स्वर्ण जातियों के लिए शिक्षा और नौकरी में 10 फ़ीसदी आरक्षण देने का ऐलान कर दिया है. 2019 के लोकसभा चुनाव के नजरिए से देखा जाए तो यह गेम चेंजर साबित हो सकता है, लेकिन इसके साथ कई किंतु-परंतु जुड़े हुए हैं. इसके लिए सरकार को संविधान के अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में बदलाव करना पड़ेगा. अगर इन दोनों अनुच्छेदों में सरकार बदलाव कर पाती है, तो आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का रास्ता साफ हो जाएगा.

क्या कहता है अनुच्छेद 15
संविधान के अनुच्छेद 15 केवल धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्म-स्थान आदि के आधार पर भेदभाव पर रोक लगाता है. अंशतः या पूर्णतः राज्य के कोष से संचालित सार्वजनिक मनोरंजन स्थलों या सार्वजनिक रिसॉर्ट में निःशुल्क प्रवेश के संबंध में यह अधिकार राज्य के साथ-साथ निजी व्यक्तियों के खिलाफ भी प्रवर्तनीय है. हालांकि राज्य को महिलाओं और बच्चों या अनुसूचित जाति और जनजाति सहित ‘सामाजिक या शैक्षिक’ रूप से पिछड़े वर्गों के नागरिकों के लिए विशेष प्रावधान बनाने से राज्य को रोका नहीं गया है. इस अपवाद का प्रावधान इसलिए किया गया है क्योंकि इसमें वर्णित वर्गों के लोग वंचित माने जाते हैं और उनको विशेष संरक्षण की आवश्यकता है.

क्या कहता है अनुच्छेद 16
अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार के संबंध में अवसर की समानता की गारंटी देता है और राज्य को किसी के भी खिलाफ केवल धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, वंश जन्म स्थान या इनमें से किसी एक के आधार पर भेदभाव करने से रोकता है. किसी भी पिछड़े वर्ग के नागरीकों का सार्वजनिक सेवाओं में पर्याप्त प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए उनके लाभार्थ सकारात्मक कार्रवाई के उपायों के कार्यान्वयन हेतु अपवाद बनाए जाते हैं. साथ ही, किसी धार्मिक संस्थान के एक पद को उस धर्म का अनुसरण करने वाले व्यक्ति के लिए आरक्षित किया जा सकता है.

यह भी पढ़ें : सिर्फ हिंदू नहीं बल्कि मुस्लिम और ईसाई भी होते हैं सवर्ण! जानिए कैसे मिलेगा आपको फायदा

किन सवर्णों को मिलेगा यह आरक्षण

⦁ जिसकी सालाना आय आठ लाख रूपये या इससे कम है.

⦁ जिसके पास 5 एकड़ या उससे कम खेती की जमीन है.
⦁ जिसका 1000 वर्ग फुट से कम जमीन पर मकान है.

⦁ कस्बों में 200 गज जमीन वाले को और शहरों में 100 गज जमीन वाले को.

⦁ पांचवा राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ , भूमिहार, बनिया, जाट, गुज्ज,र इसाई व सामान्य वर्ग के मुसलमानों को भी इसका लाभ मिलेगा.

⦁ आरक्षण शिक्षा (सरकारी या प्राइवेट) सार्वजनिक रोजगार में इसका लाभ मिलेगा.

⦁ यह आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे गरीब लोगों को दिया जाएगा जिन्हें अभी आरक्षण का फायदा नहीं मिल रहा है.

हालांकि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार 50% से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता. अभी तक 22.5% अनुसूचित जाति (दलित) और अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) के लिए आरक्षित है. इनमे अनुसूचित जातियों के लिए 15% और अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5 %. ओबीसी के लिए अतरिक्त 27% आरक्षण को शामिल करके आरक्षण का यह प्रतिशत 49.5% है. सरकार द्वारा संशोधन विधेयक लाए जाने के बाद यह कोटा 59.5 वर्ष हो जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2010 के अपने फैसले में कहा था ठोस वजह होने पर राज्य सरकार इसे बढ़ा सकती है. मौजूदा समय में तमिलनाडु में 68% (50 पर्सेंट ओबीसी और 18% अनुसूचित जनजातियों को आरक्षण है, लेकिन केंद्रीय स्तर पर अभी तक ऐसा निर्णय नहीं हो पाया है.

मोदी सरकार के इस फैसले से देश के अलग-अलग राज्यों में चले आ रहे जातीय आंदोलनों पर भी लगाम लगेगी. जिस प्रकार गुजरात में पाटीदार आंदोलन, महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन और हरियाणा में जाट आंदोलन ने सरकार के लिए बहुत बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी थी. ये तीनों जातियां पिछड़े वर्ग के कोटे में आरक्षण की मांग कर रही थी, जिसका समर्थन करना सरकार के लिए पिछड़ों की नाराजगी का कारण बन सकता था. आरक्षण की सीमा 49.5 फीसदी से 59.5 फीसदी करने से किसी से कुछ छीना नहीं जा रहा है, जिससे आदिवासियों, दलितों और पिछड़ों में इस आरक्षण की वजह से कोई नाराज नाराजगी नहीं होगी. साथ ही सवर्णों में आर्थिक रूप से कमजोर तबके की शिकायत भी दूर होगी. उसे लगता था कि केवल जाति के कारण उसकी गरीबी को गरीबी नहीं माना जाता.

बहरहाल, सरकार ने एक नए तरीके का सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग किया है. जिससे एक वर्ग को कुछ लाभ मिलने से दूसरा वर्ग नाराज नहीं हो रहा है. पक्ष-विपक्ष और क्षेत्रीय पार्टियां इस आरक्षण को खुले तौर पर समर्थन कर रही है और इसका कारण आने वाला 2019 का चुनाव है. हालांकि हमारा लोकतंत्र और संविधान समावेशी समाज की वकालत करता है जो कि व्यवहारिक तौर पर अभी भी पूरी तरह से सफल नहीं हो पाया है. अभी भी हमें समावेशी लोकतंत्र को पूरी तरह से हासिल करने के लिए काफी कुछ किया जाना शेष है और जब तक समाज के वंचित एवं आर्थिक-सामाजिक व शैक्षिक रूप से पिछड़े और पीड़ित लोग सामाजिक विकास और उसके उत्पादन के साधनों में हिस्सेदारी प्राप्त करके सम्मान पूर्वक सुरक्षित जीवन नहीं जीने लग जाते तब तक समावेशी लोकतंत्र का प्रश्न आदर्शवाद की भूल भुलैया में भटकता रहेगा.

राकेश कुमार रजक

अतिथि व्याख्याता , दिल्ली विश्वविद्यालय

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *